'सरस्वती - सरयु - सिन्धु'
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के वर्णन के अनुसार 'सरस्वती' ज्ञानवाहिनी नदी है, 'सरयु' भक्तिवाहिनी है और 'सिन्धु' कर्मवाहिनी । ये (सरस्वती सरयुः सिन्धुः) = सरस्वती, सरयु और सिन्धु तीनों ही (ऊर्मिभिः) = अपनी ज्ञान, भक्ति व कर्म की तरंगों से (महो मही:) = महान् से महान् हैं, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। ये (चक्षणी:) = [चक्ष् to grow ] हमारी उन्नति की कारणभूत नदियाँ (अवसा) = रक्षण के हेतु से यन्तु हमें प्राप्त हों। हमारे मस्तिष्क में सरस्वती का प्रवाह हो, हृदय स्थली में सरयु का तथा भुजाओं में सिन्धु प्रवाहित हो। [२] इन तीनों नदियों के (आपः) = जल (देवी:) = प्रकाश को करनेवाले हों [दिव् = द्युति], (मातरः) = हमारे जीवनों में सब अच्छाइयों का निर्माण करनेवाले हों तथा (सूदयिल्वः) = शरीर से सब मलों को दूर करनेवाले हो । क्रियाशीलता के होने पर मलों का सम्भव ही नहीं रहता। मलों का उपाय अकर्मण्यता के होने पर ही होता है । [सूद् to eject, to throw away] । सरस्वती के जल 'देवी' हों, सरयु के 'मातरः ' तथा सिन्धु के सूदयितु । [३] इन सब नदियों से प्रार्थना करते हैं कि (नः) = हमारे लिये अपने उस (पयः) = जल को (अर्चत) = [प्रयच्छत सा० ] दो जो (घृतवत्) = दीप्तिवाला तथा मलों के क्षरणवाला है और (मधुमत्) = स्वास्थ्य प्रदान के द्वारा अत्यन्त माधुर्यवाला है । सरस्वती का जल ज्ञानदीप्ति को देता है, सरयु का जल मानस मलों का क्षरण करता है, तो सिन्धु का जल स्वास्थ्य के द्वारा जीवन को मधुर बनाता है ।
Connotation: - भावार्थ- 'सरस्वती' हमारे में ज्ञान का संचार करे, 'सरयु' हमें निर्मल मनवाला बनाकर प्रभु से मिलने के योग्य बनाये तथा 'सिन्धु' हमें कर्मशील बनाकर स्वाथ्य का माधुर्य प्राप्त कराये ।