Word-Meaning: - [१] (सा) = वह (होत्रा) = सृष्टि के प्रारम्भ में प्रभु से दी जानेवाली वेदवाणी (विश्वम्) = सब (वार्यम्) = वरणीय, चाहने योग्य, जीवन के लिये उपयोगी ज्ञान को वि अश्नोति विशेषरूप से व्याप्त करती है । यह वाणी सब सत्य विद्याओं का कोश है। यह (बृहस्पतिः) = वृद्धियोंकी रक्षिका है, इस वेदवाणी के द्वारा हमारी सब प्रकार की उन्नति का सम्भव होता है। (अ-रमतिः) इसका अवसान व अन्त नहीं, अनन्त ज्ञान से यह परिपूर्ण है । जितना - जितना इसे हम पढ़ेंगे उतना उतना हमें अपना ज्ञान बढ़ता हुआ प्रतीत होगा तथा कोई ऐसी जीवन की समस्या न होगी जिसका कि इसमें हमें हल न मिले। (पनीयसी) = यह अत्यन्त उत्तम व्यवहार की साधिका तथा स्तुति को प्राप्त करानेवाली है । 'केवल प्रभु-स्तवन का ही इसके द्वारा साधन हो' ऐसी बात नहीं है । प्रभु-स्तवन के साथ यह हमारे इस संसार के व्यवहार को भी सुन्दर बनाती है। इस प्रकार अभ्युदय व निःश्रेयस दोनों का साधन करती हुई यह हमारे जीवन को धर्मयुक्त करती है । [२] यह वेदवाणी वह है (यत्र) = जिसमें वह (बृहद् ग्रावा) = महान् गुरु (उच्यते) = प्रतिपादित होता है जो कि (मधुषुत्) = मधु को ही जन्म देनेवाला है । 'स पूर्वेषामपि गुरुः ' प्रभु गुरुओं के भी गुरु हैं एवं महान् हैं। प्रभु जो भी उपदेश देते हैं, मधुरता से देते हैं। वे दण्ड देते हुए ज्ञान नहीं देते। हृदयस्थ होकर निरन्तर प्रेरणा के रूप में यह ज्ञान दिया जाता है। यह ज्ञान हमें माधुर्य का ही पाठ पढ़ाता है, हमारे जीवन को भी मधुर बनाता है । [३] (मनीषिणः) = बुद्धिमान् लोग (मतिभिः) = मनन के द्वारा (अवीवशन्त) = इस ज्ञान की निरन्तर कामना करते हैं। इस ज्ञान में ही अन्ततः उन्हें प्रभु-दर्शन होता है। इस प्रकृति से बने संसार का जितना - जितना ये बुद्धिमान् पुरुष विचार करते हैं उतना उतना वे प्रभु के समीप पहुँचते जाते हैं, एक-एक पदार्थ में उन्हें प्रभु की महिमा का दर्शन होता है ।
Connotation: - भावार्थ- वेदवाणी सब सत्य - विद्याओं का प्रतिपादन करती है, अन्ततः इसका प्रतिपाद्य विषय वे प्रभु होते हैं जिन्हें कि मनीषी लोग मनन के द्वारा प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं ।