Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के प्रसंग में ही कहते हैं कि (ते देवासः) = वे (देव नः) = हमें (एनसः) = पापों से (अद्या) = आज ही (पिपृता) = पार करें, अर्थात् पापरहित करें, (स्वस्तये) = जिससे हमारी जीवन स्थिति उत्तम हो । उन पापों से दूर करें जो आप (कृतात्) = क्रिया से निर्वृत्त हुए हैं, अर्थात् जिन पापों को हमने इस शरीर के अंगों से किया है और (अकृतात्) = जिन्हें शरीर के अंगों से तो अभी नहीं किया, अभी जो मन में ही विचार रूप में रह रहे हैं। (अकृतात्) = [करचरणादिभिरकृतात् मानसात् सा० ] उन कामिक व तामस सभी पापों से ये देव हमें बचाएँ । [२] (ये) = जो (देव ईशिरे) = अपने ईश हैं, इन्द्रियों के स्वामी हैं, जितेन्द्रिय हैं। (भुवनस्य) = इस भुवन के, लोक के प्रचेतसः प्रकृष्ट ज्ञानवाले हैं, प्रकृति व जीव को जो जानते हैं। (विश्वस्य) = सम्पूर्ण (स्थातुः जगतः च) = स्थावर व जंगम का जो (मन्तवः) = मनन करनेवाले हैं। जड़ व चेतन जगत् को समझनेवाले हैं। [३] इस जड़ व चेतन जगत् के ज्ञान से ही मार्ग का ज्ञान होता है। प्रकृति का ज्ञान शरीर स्वास्थ्य के मार्ग को बतलाता है, जीव का ज्ञान मानस स्वास्थ्य के मार्ग का प्रदर्शक होता है । इस प्रकार ये देव 'शरीर व मन' के दृष्टिकोण से ठीक मार्ग पर चलनेवाले होते हैं। ये हमें भी इस मार्ग का उपदेश देकर शरीर व मानस स्वास्थ्य को प्राप्त करायें। प्रभु का ज्ञान व स्मरण हमें इस मार्ग से भ्रष्ट होने से बचाता है।
Connotation: - भावार्थ - प्रकृति व जीव को समझनेवाले जितेन्द्रिय ज्ञानी पुरुष हमें मार्ग का ज्ञान देकर शरीर व मानस पापों से बचानेवाले हों ।