Word-Meaning: - [१] हे (विश्वेदेवासः) = सब देववृत्ति के पुरुषो! (मनुषः) = विचारशील लोगो ! (यतिष्ठन) = आप जितने भी हो, (वः) = आपमें से (स्तोमं राधति) = जो स्तुति समूह को सिद्ध करता है, उस स्तुति- समूह को (यं जुजोषथ) = जिसको आप भी प्रीतिपूर्वक सेवन करते हो, जो स्तुति-समूह आपको भी बड़ा रुचिकर प्रतीत होता है, वह व्यक्ति ही (कः) = आनन्दमय जीवनवाला है । देववृत्ति का विचारशील पुरुष स्तुति में लीन होता है तो एक आनन्द का अनुभव करता है। [२] हे (तुवि - जाताः) = महान् विकासवाले पुरुषो ! (वः) = तुम्हारे में से (यः) = जो (अध्वरम्) = हिंसारहित यज्ञात्मक कर्मों को (अरं करद्) = अलंकृत करता है अथवा खूब ही करता है वही (कः) = आनन्दस्वरूप होता है और वह (नः) = हमें (अहः अतिपर्षत्) = पाप के पार ले जाता है, हमें पापों से बचाता है और इस प्रकार स्वस्तये उत्तम स्थिति के लिये होता है । हमें अपने क्रियात्मक जीवन से सद्गुणों का पाठ पढ़ाता हुआ वह पापों से बचानेवाला होता है और इस प्रकार हमारा जीवन उत्तम बनता है ।
Connotation: - भावार्थ - आनन्द में वही है जिसका जीवन स्तुतिमय है व जो यज्ञशील है । सूचना - पाँचवें व छठे मन्त्र का सार यह है कि जीवन का उत्कर्ष 'आदित्यों के सम्पर्क में ज्ञान की वृद्धि, स्तुतिमयता व यज्ञशीलता' में ही है। इनकी आधारभूत वस्तु स्वास्थ्य है। [क] स्वस्थ होता हुआ मनुष्य, [क] ज्ञान प्रधान जीवन बिताये, [ग] स्तुति में लीन व [घ] यज्ञशील हो। इसी में सुख है ।