Word-Meaning: - [१] (तान्) = उन (आदित्यान्) = सब स्थानों से गुणों का ग्रहण करनेवाले (महः) = गुणों के आधिक्य से महनीय देवों को (नमसा) = नमन के द्वारा और (सुवृक्तिभिः) = सुष्ठु दोष वर्जन के द्वारा, प्रयत्नपूर्वक दोषों को दूर करने के द्वारा, (आविवास) = पूजित कर । बड़ों का आदर दो ही प्रकार से होता है, [क] उनके प्रति नम्रता के धारण से तथा [ख] अपने दोषों को दूर करने से। यदि हम नमस्ते तो करें, पर उनके कहने के अनुसार अपनी कमियों को दूर करने का प्रयत्न न करें तो यह उनका निरादर ही है। [२] हम उन आदित्यों का आदर तो करें, साथ ही (अदितिम्) = [अ खण्डन] स्वास्थ्य का भी आदर करें। स्वास्थ्य का भी पूरा ध्यान करें। (स्वस्तये) = [सु+अस्ति ] उत्तम स्थिति के लिये आदित्यों व अदिति दोनों का पूजन आवश्यक है । [३] आदित्य वे हैं ये जो [क] (सम्राजः) = दीप्त व व्यवस्थित जीवनवाले हैं, जिनकी सब भौतिक क्रियाएं ठीक समय पर होती हैं [well regulated] और अतएव [ख] (सुवृधः) = उत्तम वर्धनवाले हैं। ठीक समय पर क्रियाओं के होने से उनके सब अंग-प्रत्यंगों की शक्ति का ठीक से विकास होता है। [ग] जो विकसित शक्तिवाले होकर (यज्ञं आययुः) = श्रेष्ठतम कर्मों को प्राप्त होते हैं । [घ] (अपरिहृताः) = जो सब प्रकार की कुटिलता से रहित हैं। श्रेष्ठतम कर्मों का कुटिलता से समन्वय सम्भव ही नहीं । [ङ] जो (दिवि) = मस्तिष्क रूप द्युलोक में (क्षयम्) = निवास को दधिरे धारण करते हैं। जिनका जीवन ज्ञान प्रधान होता है, वे ही आदित्य हैं। ये भावुकता में बहकर न्याय्य पथ को छोड़ नहीं देते। इनकी श्रद्धा भी ज्ञानोज्ज्वल होती है। इन आदित्यों के सम्पर्क में तो हम आयें ही, साथ ही स्वास्थ्य का पूरा ध्यान करें। तभी हमारी स्थिति उत्तम होगी।
Connotation: - भावार्थ - आदित्यों व अदिति का पूजन हमारी स्थिति को उत्तम बनाये ।