प्रभु के नाम 'नमस्य वन्द्य व यज्ञीय' हैं
Word-Meaning: - [१] हे (देवा:) = देववृत्ति के पुरुषो ! (वः) = आपके लिये (हि) = निश्चय से (विश्वानामानि) = प्रभु के सब नाम (नमस्यानि) = परिचर्या के योग्य हैं, उपासनीय हैं। ये नाम (वन्द्या) = स्तुत्य हैं, इनके द्वारा प्रभु का उत्तमता से स्तवन होता है (उत) = और ये नाम (वः) = आपके लिये (यज्ञिया) = संगतिकरण योग्य, हैं। इन नामों के द्वारा आप प्रभु की परिचर्या करते हैं । इनके द्वारा प्रभु का स्तवन होता है और आप इन नामों के अन्दर निहित भाव को प्रेरणा के रूप में लेकर अपने जीवन को प्रभु जैसा बनाने का प्रयत्न करते हैं। [२] (ये) = जो देव (अदितेः) = द्युलोक के दृष्टिकोण से [अदिति द्य०] (जाताः स्थ) = विकासवाले हुए हैं, इसी प्रकार (अद्भ्यः) = अन्तरिक्षलोक के दृष्टिकोण से (परिजाताः स्थ) = पूर्ण विकासवाले हुए हैं और (ये) = जो (पृथिव्याः) = पृथिवी के दृष्टिकोण से (जाताः स्थ) = विकसित हुए हैं (ते) = वे देव (मे हवम्) = मेरी प्रार्थना को (इह) = यहाँ (श्रुता) = सुनें । मस्तिष्क ही द्युलोक है, अन्तरिक्ष है और पृथिवी शरीर है । मस्तिष्क हृदय व शरीर तीनों को दृष्टिकोण से जिन्होंने अपना विकास ठीक रूप में किया है वे देव हमारी प्रार्थना को सुनें और हमें उपदेश के देनेवाले हैं। उनके पगचिह्नों पर चलते हुए हम भी मस्तिष्क, हृदय व शरीर का विकास कर पायें ।
Connotation: - भावार्थ- देव लोग प्रभु के सब नामों से उसका उपासन व स्तवन करते हुए उन नामों की भावना को अपने जीवन का अंग बनाने का प्रयत्न करते हैं । ये मस्तिष्क, हृदय व शरीर तीनों का विकास करनेवाले होते हैं ।