Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्र) = परमात्मन् ! (रथम्) = हम उस शरीर रथ पर (आरुहेम) = आरोहण करें जो (प्रातर्या-वाणम्) - प्रातः से ही गतिमय है, अर्थात् इस शरीर रथ पर आरूढ़ होकर हम सदा क्रियाशील जीवन बिताएँ । (सानसिम्) = जो सम्भजनशील हैं, जिस शरीररथ पर आरूढ़ होकर हम प्रातः - सायं उस प्रभु का सम्भजन करनेवाले होते हैं। इस प्रभु-सम्भजन से ही हम स्वस्थ शरीरवाले रहते हैं, (अरिष्यन्तम्) = जो शरीर रथ हिंसित नहीं होता, विविध आधि-व्याधियों का शिकार नहीं होता । [२] एवं हम उस शरीर रथ पर आरोहण करते हैं जो कि 'गतिमय, उपासनामय व नीरोगता' वाला है। इस शरीर रथ पर आरोहण करके हम (स्वस्तये) = जीवन में उत्तम स्थितिवाले होते हैं । यह शरीर - रथ वह है (यम्) = जिसको (देवासः) = सब प्राकृतिक शक्तियाँ, सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, जल आदि (वाजसातौ) = शक्ति प्राप्ति के निमित्त अवथ-रक्षित करते हैं। सूर्यादि की अनुकूलता के होने पर शरीर की शक्ति बढ़ती है । [२] यह शरीररथ वह है (यम्) = जिसको (मरुतः) = प्राण (शूरसातौ) = इस संसार संग्राम में (हितेधने) = हितकर धन की प्राप्ति के निमित्त (अवथ) = रक्षित करते हैं । प्राणसाधना से हमारे शरीर, मन व बुद्धि की शक्तियाँ बढ़ती हैं, हम संसार - संग्राम में विजयी होते हैं और हितकर धनों को प्राप्त करनेवाले होते हैं। प्रत्येक कोश का धन पृथक्-पृथक् है, वह धन हमें इस प्राणसाधना से प्राप्त होता है। यह धन वेद के शब्दों में 'अन्नमयकोश का तेज, प्राणमयकोश का वीर्य, मनोमयकोश का ओज व बल, विज्ञानमयकोश का मन्यु-ज्ञान तथा आनन्दमयकोश का सहस्' है । प्राणसाधना से यह सब धन प्राप्त होता है। इस प्रकार हमारे इस शरीर रथ को सब देव सुरक्षित करते हैं और मरुत् इसे उत्कृष्ट धनों से परिपूर्ण करते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- हम इस शरीर को 'गतिमय, उपासनामय व स्वस्थ' बनायें। सब प्राकृतिक शक्तियों की अनुकूलता से यह स्वस्थ हो तथा प्राणसाधना से यह हितकर धनों से परिपूर्ण हो ।