Word-Meaning: - [१] (स मर्तः) = वह मनुष्य (विश्वः) = सारे का सारा, अर्थात् पूर्णरूप से (अरिष्टः) = अहिंसित होता हुआ (एधते) = बढ़ता है, वृद्धि को प्राप्त करता है और (धर्मणः) = धर्म के द्वारा (प्रजाभिः) = अपने सन्तानों के साथ (परिप्रजायते) = सब प्रकार के विकास को प्राप्त करता है, (यम्) = जिस पुरुष को हे (आदित्यासः) = सब ज्ञानों व गुणों का आदान करनेवाले देवो! आप (सुनीतिभिः) = उत्तम मार्गों से हमें कल्याण के लिये (नयथा) = ले चलते हैं । [२] ये पाप हमारे न चाहते हुए भी हमारे में प्रविष्ट हो जाते हैं, अतः इन्हें 'विश्व' कहा गया है [विशन्ति] । आदित्यों का उपदेश हमें इस योग्य बनाता है कि हम इन पापों से बचे रहते हैं। धर्म के मार्ग पर चलते हुए हम अपने जीवनों को उत्तम बनाते हैं, साथ ही हमारे सन्तानों के जीवन भी सुन्दर बनते हैं । इस प्रकार (स्वस्तये) = हम उत्तम स्थिति के लिये होते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- आदित्यों का उपदेश हमें सदा सन्मार्ग के दिखानेवाला हो, उस पर चलते हुए हम दुरितों से दूर हों और स्वस्ति को सिद्ध करें ।
Cross References: सूचना - यहाँ 'विश्वः एधते'- इन शब्दों से यह स्पष्ट है कि केवल शरीर, केवल मन व केवल मस्तिष्क का विकास वेद को अभीष्ट नहीं । वेद के दृष्टिकोण से 'शरीर, मन व मस्तिष्क' का सम्मिलित विकास ही विकास है । यही स्थानान्तर में 'त्रिविक्रम बनना' कहा गया है। तीनों कदमों का रखना ही ठीक है ।