Word-Meaning: - [१] (विरूपासः) = गत मन्त्रों के अनुसार अपने जीवनों को बनानेवाले व्यक्ति विशिष्टरूपवाले होते हैं, ये औरों की तुलना में कहीं आगे बढ़े हुए होते हैं, ये तेजस्विता से दीप्त होते हुए चमकते हैं, (इत्) = निश्चय से (ऋषयः) = तत्त्वद्रष्टा बनते हैं। शरीर में 'विरूप', मस्तिष्क में 'ऋषि' बनकर आदर्श पुरुष प्रतीत होते हैं। [२] (ते) = वे (इत्) = निश्चय से (गम्भीरवेपसः) = [गम्भीरकर्माणः] गम्भीर कर्मोंवाले होते हैं। ये प्रत्येक कर्म को उचित गम्भीरता के साथ करते हैं । [३] (ते) = वे (अंगिरसः सूनवः) = अंगिरस् के पुत्र कहलाते हैं । अर्थात् उत्कृष्ट अंगिरस होते हैं, इनके अंग-प्रत्यंग सब सशक्त बने रहते हैं, उसके अंगों में लोच-लचक बनी रहती है । [४] (ते) = वे (अग्नेः) = उस परमात्मा से (परिजज्ञिरे) = प्रादुर्भूत शक्तिवाले होते हैं, प्रभु की उपासना से इन्हें शक्ति प्राप्त होती है, इसकी शक्तियों के प्रादुर्भाव का रहस्य इनका प्रभु उपासन है ।
Connotation: - भावार्थ- हम 'तेजस्वी ज्ञानी-गम्भीरता से कर्मों को करनेवाले, सरस अंगोंवाले' बनें। ऐसा बनने के लिये प्रभु का उपासन करें।