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अ॒यं नाभा॑ वदति व॒ल्गु वो॑ गृ॒हे देव॑पुत्रा ऋषय॒स्तच्छृ॑णोतन । सु॒ब्र॒ह्म॒ण्यम॑ङ्गिरसो वो अस्तु॒ प्रति॑ गृभ्णीत मान॒वं सु॑मेधसः ॥

English Transliteration

ayaṁ nābhā vadati valgu vo gṛhe devaputrā ṛṣayas tac chṛṇotana | subrahmaṇyam aṅgiraso vo astu prati gṛbhṇīta mānavaṁ sumedhasaḥ ||

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Pad Path

अ॒यम् । नाभा॑ । व॒द॒ति॒ । व॒ल्गु । वः॒ । गृ॒हे । देव॑ऽपुत्राः । ऋ॒ष॒यः॒ । तत् । शृ॒णो॒त॒न॒ । सु॒ऽब्र॒ह्म॒ण्यम् । अ॒ङ्गि॒र॒सः॒ । वः॒ । अ॒स्तु॒ । प्रति॑ । गृ॒भ्णी॒त॒ । मा॒न॒वम् । सु॒ऽमे॒ध॒सः॒ ॥ १०.६२.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:62» Mantra:4 | Ashtak:8» Adhyay:2» Varga:1» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:5» Mantra:4


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (देवपुत्राः-ऋषयः) हे परमात्मदेव के पुत्रसमान मन्त्रार्थद्रष्टाओं ! (अयं नाभा) यह प्रसिद्ध परमात्मा मनुष्यों के मध्य में वर्तमान (वः-गृहे) तुम्हारे हृदय-गृह में (वल्गु वदति) वेद-वाणी का उपदेश देता है (तत्-शृणोतन) उसे तुम सुनो  (अङ्गिरसः-वः) हे अङ्गियों आत्माओं के ज्ञानदाता, स्वयंसंयमी विद्वानों ! तुम्हारे लिए (सुब्रह्मण्यम्-अस्तु) शोभन ब्रह्मप्राप्ति फल होवे। आगे पूर्ववत् ॥४॥
Connotation: - आरम्भ सृष्टि में योग्य चरम ऋषि मन्त्रार्थद्रष्टाओं के अन्तःकरण में परमात्मा वेद का प्रवचन करता है। वे अन्य आत्माओं को उसका उपदेश करते हैं। यह ब्रह्मप्राप्ति का सुखद साधन है ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सुब्रह्मण्यम्

Word-Meaning: - [१] (अयम्) = यह (नाभा) = नाभानेदिष्ठ [सूक्त का ऋषि], यज्ञों को केन्द्र बनाकर उनके समीप रहनेवाला, (वः) = तुम्हारे (गृहे) = घर में (वल्गु वदति) = शुभ व सुन्दर ही शब्द बोलता है । यहाँ सन्तानों को सम्बोधन करते हुए यह कहना कि '(वः) = तुम्हारे घर में', उन सन्तानों को प्रेरणा देता है कि 'घर हमारा है, इसे हमने अच्छा बनाना है।' [२] पिता पुत्रों को कहता है कि हे देव (पुत्राः) = देव पुत्रों, दिव्यगुणों का वर्धन करनेवाले पुत्रो ! (ऋषयः) = तत्त्वद्रष्टा ज्ञानियो ! ज्ञान प्राप्त करनेवालो ! (तत् शृणोतन) = उन शुभ शब्दों को सुनो। सन्तान 'देव पुत्र, ऋषि' आदि शुभ शब्दों को सुनेंगे तो वैसे ही बनेंगे। 'नालायक' आदि शब्दों को सुनकर वे नालायक ही बन जाएँगे। [३] इस प्रकार शुभ शब्दों के बोलनेवाले (अंगिरसः) = रसमय अंगोंवाले पुरुषो! (वः) = तुम्हारे लिये (सुब्रह्मण्यं अस्तु) = ज्ञाननैपुण्य हो, तुम वेदज्ञान में पूर्ण कुशलतावाले बनो। और (सुमेधसः) = उत्तम मेधावी बनकर (मानवम्) = मानवधर्म को (प्रति गृभ्णीत) = ग्रहण करो । मानवहित के कार्यों में सदा रत रहो ।
Connotation: - भावार्थ - यज्ञशील पुरुष घर में सन्तानों को 'देव पुत्र व ऋषि' उत्तम शब्दों से ही सम्बोधित करता है, इन उत्तम शब्दों से प्रेरणा को लेते हुए वे 'देव पुत्र व ऋषि' ही बनते हैं। मन उनके देवों के समान होते हों, मस्तिष्क ऋषियों के तुल्य । ये अंगिरस होते हुए उत्तम ज्ञानवाले होते हैं।
Cross References: सूचना - इन चार मन्त्रों में 'भद्र, दीर्घायुत्व, सुप्रजास्त्व व सुब्रह्मण्य' इन चार बातों का उल्लेख हुआ है, जहाँ भी ये चार बातें होंगी वहाँ लोग अगले मन्त्र के अनुसार 'विरूप' विशिष्ट रूपवाले बनेंगे-

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (देवपुत्राः-ऋषयः) हे देवस्य परमात्मनः पुत्राः पुत्रवद्वर्तमाना मन्त्रार्थद्रष्टारः ! (अयं नाभा) अयं प्रसिद्धः परमात्मा युष्माकं मध्ये वर्तमानः (वः-गृहे) युष्माकं हृदयगृहे (वल्गु वदति) वेदवाचम् “वल्गु वाङ्नाम” [निघण्टु १।११] (तत्-शृणोतन) तद्वचनं शृणुत (अङ्गिरसः वः सुब्रह्मण्यम्-अस्तु) अङ्गिनामात्मनां ज्ञानदातारः, स्वयं संयमिनो देवाः ! युष्मभ्यं शोभनब्रह्मत्वं शोभनब्रह्मप्राप्तिफलं भवतु। अग्रे पूर्ववत् ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O children of divinity, seers and visionaries, this central soul speaks the voice divine in your yajnic home, in the core of your heart. Listen to that. O Angirasas, may this divine voice be yours and your heritage to your posterity. O sages of holy mind and wisdom, pray take the children of humanity under your care.