Word-Meaning: - [१] (अयम्) = यह (नाभा) = नाभानेदिष्ठ [सूक्त का ऋषि], यज्ञों को केन्द्र बनाकर उनके समीप रहनेवाला, (वः) = तुम्हारे (गृहे) = घर में (वल्गु वदति) = शुभ व सुन्दर ही शब्द बोलता है । यहाँ सन्तानों को सम्बोधन करते हुए यह कहना कि '(वः) = तुम्हारे घर में', उन सन्तानों को प्रेरणा देता है कि 'घर हमारा है, इसे हमने अच्छा बनाना है।' [२] पिता पुत्रों को कहता है कि हे देव (पुत्राः) = देव पुत्रों, दिव्यगुणों का वर्धन करनेवाले पुत्रो ! (ऋषयः) = तत्त्वद्रष्टा ज्ञानियो ! ज्ञान प्राप्त करनेवालो ! (तत् शृणोतन) = उन शुभ शब्दों को सुनो। सन्तान 'देव पुत्र, ऋषि' आदि शुभ शब्दों को सुनेंगे तो वैसे ही बनेंगे। 'नालायक' आदि शब्दों को सुनकर वे नालायक ही बन जाएँगे। [३] इस प्रकार शुभ शब्दों के बोलनेवाले (अंगिरसः) = रसमय अंगोंवाले पुरुषो! (वः) = तुम्हारे लिये (सुब्रह्मण्यं अस्तु) = ज्ञाननैपुण्य हो, तुम वेदज्ञान में पूर्ण कुशलतावाले बनो। और (सुमेधसः) = उत्तम मेधावी बनकर (मानवम्) = मानवधर्म को (प्रति गृभ्णीत) = ग्रहण करो । मानवहित के कार्यों में सदा रत रहो ।
Connotation: - भावार्थ - यज्ञशील पुरुष घर में सन्तानों को 'देव पुत्र व ऋषि' उत्तम शब्दों से ही सम्बोधित करता है, इन उत्तम शब्दों से प्रेरणा को लेते हुए वे 'देव पुत्र व ऋषि' ही बनते हैं। मन उनके देवों के समान होते हों, मस्तिष्क ऋषियों के तुल्य । ये अंगिरस होते हुए उत्तम ज्ञानवाले होते हैं।
Cross References: सूचना - इन चार मन्त्रों में 'भद्र, दीर्घायुत्व, सुप्रजास्त्व व सुब्रह्मण्य' इन चार बातों का उल्लेख हुआ है, जहाँ भी ये चार बातें होंगी वहाँ लोग अगले मन्त्र के अनुसार 'विरूप' विशिष्ट रूपवाले बनेंगे-