राष्ट्रपति के तीन कर्त्तव्य
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र में जिसे 'वास्तोष्पति व व्रतपा' कहा है (स) = वह राष्ट्रगृह का रक्षक राष्ट्रपति (ईम्) = निश्चय से वृषा शक्तिशाली होता है । परन्तु शक्तिशाली होता हुआ यह (आजौ) - संग्राम में (फेनम्) = बढ़े हुए धन को (न अस्यत्) = नहीं फेंकता है। यह धन का युद्धों में अपव्यय नहीं करता है। सेना को सुशिक्षित बनाकर यह राष्ट्र को शक्ति सम्पन्न तो बनाता है, परन्तु यथासम्भव राष्ट्र को युद्ध में न झोंकने के लिये यत्नशील रहता है। 'फेन' शब्द बढ़े हुए धन के लिये तो प्रयुक्त होता ही है । इस शब्द का प्रसिद्ध अर्थ झाग है । 'इसे क्रोध में मुँह से झाग आने लगे ऐसी बात नहीं है । क्रोधान्वित होकर यह युद्ध ही शुरु कर दे ऐसा नहीं होता। ऐसा (दभ्रचेताः) = अल्प चेतनावाला (स्मत्) = हमारे से (आ) = सर्वथा (अप परैत्) = दूर ही रहें। नासमझ राष्ट्रपति राष्ट्र को युद्धों में उलझाये रखेगा। [२] (दक्षिणा परावृड्) = दान आदि का (परावर्जयिता) = राष्ट्रहित के लिये रुपये को न व्यय करनेवाला (पदा न सरत्) = कदमों को हमारी ओर रखनेवाला न हो। अर्थात् राष्ट्रपति ऐसा ही होना चाहिए जो कि राष्ट्रहित के कार्यों में उदारतापूर्वक धन का व्यय कर सके । 'कर' तो ले, पर उस धन का राष्ट्रहित में व्यय न करे ऐसा राष्ट्रपति तो व्यर्थ ही है, वह राष्ट्र की किसी भी प्रकार अभ्युत्थान न कर सकेगा। [३] (पृशन्यः) = ज्ञान वाणियों के स्पर्श में कुशल यह राष्ट्रपति (मे) = मेरी (ता) = उन वाणियों को (नु) = निश्चय से (न जगृभ्रे) = पकड़ नहीं लेता । यह वाणी पर प्रतिबन्ध नहीं लगा देता, भाषण स्वातन्त्र्य पर यह रोक नहीं लगा देता ।
Connotation: - भावार्थ - [क] राष्ट्रपति शक्ति को बढ़ा करके भी राष्ट्र को युद्धों में न झोंको रखे, [ख] राष्ट्रहित के कार्यों में उदारता से व्यय कर सके, [ग] भाषण स्वातन्त्र्य पर प्रतिबन्ध न लगा दे।