Word-Meaning: - [१] (ते) = वे (यजत्राः) = यष्टव्य, पूज्य संगतिकरण योग्य व सब कुछ देनेवाले (देवासः) = देवो ! आप (ऊ) = निश्चयपूर्वक (सु) = उत्तमता से (नः) = हमारे (महः) [ महते ] = महान् (उतये) = रक्षण के लिये (सजोषाः) = समानरूप से प्रीतिवाले (भूत) = होइये । सब देव ऐकमत्यवाले होकर हमारा रक्षण करनेवाले हों । सूर्य-चन्द्रादि देव हमारे अनुकूल होकर हमें स्वास्थ्य प्राप्त कराते हैं । तथा विद्वान् ज्ञानी पुरुष ज्ञान के द्वारा हमारा कल्याण करनेवाले होते हैं। सामान्यतः 'माता, पिता, आचार्य व अतिथि' रूप सब देव एक निश्चय से चलते हैं तो एक बालक को एक 'सज्जन ज्ञानी' के रूप में बनानेवाले होते हैं। [२] ये सब देव वे हैं (ये) = जो (वियन्तः) = विविध गतियों को करते हुए, (वाजान्) = विविध शक्तियों को (अनयत) = हमें प्राप्त कराते हैं। माता 'चरित्र - बल' को प्राप्त कराती है, पिता 'आचार शक्ति' को । आचार्य 'ज्ञान के बल' को देते हैं तो अतिथि 'धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति' को देनेवाले होते हैं, ये हमें धर्म मार्ग से विचलित नहीं होने देते। इन देवों के अतिरिक्त प्राकृतिक देव अपनी अनुकूलता से हमें 'स्वास्थ्य का बल' प्राप्त कराते हैं । [३] ये 'माता, पिता, आचार्य व अतिथि' वे देव हैं (ये) = जो (निचेतारः स्थ) = निश्चय से ठीक मार्ग का चयन करनेवाले हैं, ये गलत मार्ग से हमें सदा बचाते हैं, यदि (अमूराः) = ये अमूढ़ होते हैं, किसी प्रकार के मोह में फँसे हुए नहीं होते। मोह में फँसकर माता-पिता से भी गलती हो सकती है। अमूढ़ माता-पिता बालक को ज्ञानी व सदाचारी बना ही पाते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- सब देव हमारे रक्षक हों, ये हमें विविध शक्तियों को प्राप्त करानेवाले हों । सूक्त का प्रारम्भ 'आँख, कान, नासिका, मुख' आदि की न्यूनताओं को दूर करके उनके पूरण की प्रार्थना से हुआ है [६१.१] और समाप्ति पर सब देवों से विविध शक्तियों की प्राप्ति की प्रार्थना है [६१.२७] अव नाभानेदिष्ठ यह प्रार्थना करता है कि हम यज्ञ व दान वृत्ति से युक्त हों और अमृतत्व को प्राप्त करें-