Word-Meaning: - [१] (अध) = अब (यद्) = यदि (ना) = मनुष्य उन्नतिपथ पर चलनेवाला व्यक्ति [नृ=नये] (राजा) = बड़े व्यवस्थित जीवनवाला [regulated] और अतएव दीप्त जीवनवाला होता है [राज् दीप्तौ] तो यह (गविष्टौ) = उस आत्मतत्त्व के अन्वेषण में (सरत्) = गति करता है [in search of god] इसकी सब क्रियाएँ आत्मतत्त्व के अन्वेषण के लिये होती हैं । [२] यह (सरण्युः) = उत्कृष्ट गतिवाला पुरुष (कारवे) = उस कलापूर्ण कृतिवाले प्रभु के लिये (जरण्युः) = स्तोता होता है, उस प्रभु की विभूतियों का स्मरण करता हुआ उस प्रभु की भक्ति में मग्न हो जाता है। एक-एक पदार्थ में इसे प्रभु की महिमा दृष्टिगोचर होती है । [३] (विप्रः) = प्रभु-भक्ति करता हुआ यह अपना विशेषरूप से पूरण करता है [वि-प्रा]। (एषां सः हि) = इन जीवों में अपना पूरण करनेवाला यह विप्र ही (प्रेष्ठः) = प्रभु का प्रियतम होता है। उन्नति करनेवाला पुत्र पिता को प्रिय होता ही है । (च) = और यह (परावक्षत्) = अपने को सब दुरितों से परे ले चलता है (उत) = और (एनान्) = अपने अन्य साथियों को भी (पर्षत्) = अवाञ्छनीय वस्तुओं से पार ले चलता है। अपने जीवन को अच्छा बनाकर दूसरों के जीवनों को भी उत्तम बनाता है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभुभक्त सदा आत्मतत्त्व के अन्वेषण में चलता है यह प्रत्येक पदार्थ में प्रभु की विभूति को देखता हुआ उत्तम जीवनवाला व प्रभु का प्रिय होता है । यह अपने को दुरितों से दूर ले चलता है, औरों के भी कल्याण करनेवाला होता है। यह सरण्य व जरण्यु होता है, 'गतिशील प्रभु का स्तोता' ।