Word-Meaning: - [१] हे (नृपते) = नरों के रक्षक (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (अध) = अब (त्वम्) = आप (अस्मान्) = हमें (महोराये) = महान् धन के लिये (विद्धि) = जानिये । आपकी कृपा से हम महनीय धन को प्राप्त करनेवाले हों । धन को तो हम प्राप्त करें ही, पर वह धन उत्तम साधनों से ही सदा कमाया जाए। [२] हे प्रभो ! आप (वज्रबाहुः) = वज्रयुक्त बाहुवाले हैं, दुष्टों को दण्ड देनेवाले हैं। (नः) = हमारे (मघोनः) = यज्ञशील (सूरीन्) = ज्ञानी पुरुषों को (रक्षा च) = अवश्य रक्षित करिये। आपकी रक्षा के पात्र वे ही होते हैं जो कि उत्तम साधनों से कमाये गये धनों का यज्ञात्मक कर्मों में ही विनियोग करते हैं और जो ज्ञान को महत्त्व देते हैं। [३] हे (हरिवः) = प्रशस्त इन्द्रिय रूप अश्वों को प्राप्त करानेवाले प्रभो! (ते) = आपकी अभिष्टौ प्राप्ति में, अभिगमन में (अनेहसः) = हम पाप शून्य जीवनवाले हों आप हमें उत्तम इन्द्रियों को प्राप्त कराते हैं, आपकी उपासना से वे इन्द्रियाँ उत्तम ही बनी रहती हैं, विषय पंक में वे इन्द्रियाँ फँसनेवाली नहीं होती। प्रभु की उपासना से बासनाएँ विनष्ट होती हैं और हमारा जीवन पवित्र बना रहता है ।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु कृपा से हमें महान् धन प्राप्त हो । यज्ञशील ज्ञानी बनकर हम आपकी रक्षा के पात्र हों। आपकी उपासना से हमारा जीवन निष्पाप हो ।