शरीर को यज्ञवेदि बना देना
Word-Meaning: - [१] (स) = वह (नाभानेदिष्ठ इत्) = निश्चय से दानाय दान के लिये तथा (दभ्याय) = लोभादि के हिंसन के लिये (वन्वन्) = [वन् = win ] इन्द्रियों को जीतने का प्रयत्न करता है । जितेन्द्रिय बनकरके ही वह लोभादि का हिंसन करता है और त्याग को अपना पाता है । यह (सूदैः) = लोभादि के हिंसनों से (च्यवामः) = सब मलों को अपने से दूर करता हुआ (वेदिं अमिमीत) = वेदि को बनाता है, अर्थात् अपने शरीर को यज्ञस्थली के रूप में परिवर्तित कर देता है । इसका जीवन यज्ञमय बन जाता है, यह सचमुच नाभानेदिष्ट यज्ञरूप केन्द्र के समीप रहनेवाला हो जाता है । [२] (तूर्वयाणः) = शीघ्रता से गमनवाला, स्फूर्ति से कार्यों को करनेवाला यह होता है। (गूर्तवचस्तमः) = अतिशयेन ज्ञान की वाणियों को उठाने व धारण करनेवाला बनता है। और 'तूर्वयाण व गूर्तवचस्तम' बनने के लिये ही (क्षोदो न) = उदक के समान (रेतः) = शरीर में स्थितिवाले इन रेतःकणों को यह (इत ऊति) = इस संसार की वासनाओं से व रोगों से अपने रक्षण के लिये (असिञ्चत्) = शरीर में ही सिक्त करता है । इन रेतःकणों को शरीर में ऊर्ध्वगतिवाला करके यह ऊर्ध्वरेता बनता है। इन सुरक्षित रेतः कणों से यह रोगों व वासनाओं के आक्रमण से बचा रहता है ।
Connotation: - भावार्थ - जितेन्द्रिय बनकर हम शरीर को यज्ञवेदी का रूप देनेवाले हों । रेतः कणों को शरीर में ही ऊर्ध्वगति के द्वारा व्याप्त करके हम अपना रक्षण करें, रोगों व वासनाओं का शिकार न हों ।