Word-Meaning: - [१] वह प्राणसाधक (तद्बन्धुः) = [तस्य बन्धुः, स बन्धुर्यस्य इति वा] उस सर्वव्यापक प्रभु रूप बन्धुवाला होता है । 'तनु विस्तारे' से बना 'तद्' शब्द सर्वव्यापकता की सूचना देता है। इस सर्वव्यापक प्रभु को ही यह अपना बन्धु मानता है ‘स नो बन्धुर्जनिता स विधाता० ' । (सूरिः) = यह उस प्रभु की स्तुति का प्रेरक होता है, सदा प्रभु का स्तवन करता है। (ते दिवि) = आपके [उस प्रभु के] ज्ञान के प्रकाश में (धियन्धाः) = ज्ञानपूर्वक कर्मों का धारण करनेवाला होता है । [२] यह ज्ञानपूर्वक कर्मों को करनेवाला (नाभानेदिष्ठः) = 'अयं यज्ञों भुवनस्य नाभिः ' यज्ञ रूप भुवननाभि के समीप रहनेवाला होता है। यज्ञ को यह भुवनों का केन्द्र जानता है, 'यज्ञ में ही लोक प्रतिष्ठित है' ऐसा समझता हुआ यह यज्ञों से अपने को दूर नहीं करता । (प्रवेनन्) = प्रभु प्राप्ति की प्रबल कामना करता हुआ यह परति प्रभु के नामों का जप करता है। [३] (सा) = वह यज्ञ ही (नः) = हमारी (परमा नाभिः) = सर्वोत्कृष्ट नाभि हो, यज्ञ ही हमारे जीवन का केन्द्र बनता है। (वा) = और इस यज्ञ के द्वारा (अहम्) = मैं (घा) = निश्चय से (अस्य) = इस परमात्मा का होता हूँ यज्ञ से ही तो प्रभु का पूजन होता है 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः ' । (तत् पश्वाः) = यज्ञ के द्वारा प्रभु-पूजन करने के पीछे (कतिथः) = [advanced to a eertain degree] कुछ उन्नत (चित्) = निश्चय से (आस) = मैं हुआ हूँ । 'प्रभु को बन्धु बनाकर चलना, अपने में स्तुति को प्रेरित करना, प्रभु के प्रकाश में ज्ञानपूर्वक कर्मों को करना, यज्ञ को अपनाना, प्रभु नाम का जप' यही उन्नति का मार्ग है, इस पर चलने से ही हम कुछ उन्नत होते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु को बन्धु समझना, तदुपदिष्ट यज्ञों में प्रवृत्त होना ही उन्नति का मार्ग है।