Word-Meaning: - [१] राष्ट्रपति (कनायाः) = ज्ञानदीप्त सभ्यों के कारण चमकनेवाली सभा की (नवीयः) = स्तुत्यतम (सख्यम्) = मित्रता को (मक्षू तुरण्यन्) = शीघ्रता से उत्पन्न करता है, अर्थात् प्रयत्न करता है कि उसका सभा से किसी प्रकार का विरोध न हो। इस सभा के साथ अविरोध के द्वारा वह राष्ट्रपति (राधः न) = सम्पत्ति व सफलता की तरह रेतः-शक्ति को और (इत्) = निश्चय से ऋतम् न्याय्य व्यवस्था [=ठीक शासन] को (तुरण्यन्) = शीघ्रता से उत्पन्न करता है। जब राष्ट्र में राष्ट्रपति व सभा में मैत्री का भाव, अर्थात् अविरोध चलता है तो राष्ट्र की सम्पत्ति, शक्ति व न्याय्य व्यवस्था में वृद्धि ही वृद्धि होती है । [२] (ते) = वे सभा के सभ्य (यत्) = जब (शुचि रेक्ण) = पवित्र धन को ही (आयजन्त) = अपने साथ संगत करनेवाले होते हैं तो वह पवित्र धन (सबर्दुघायाः) = अमृत का दोहन करनेवाली (उस्त्रियायाः) = गौ के (पयः) = दूध के समान होता है। इन बड़े व्यक्तियों में यदि किसी भी प्रकार के अन्याय्य धन को कमाने की रुचि न हो राष्ट्र के कार्यकर्ताओं में रिश्वत आदि लेने की भावना का उच्छेद हो जाता है और राष्ट्रकोश उस धन से परिपूर्ण होता है, जो धन कि राष्ट्र के लिये अमृत के तुल्य प्रमाणित होता है ।
Connotation: - भावार्थ - राष्ट्रपति व सभा का अविरोध राष्ट्र की सम्पत्ति शक्ति व न्याय्य व्यवस्था के वर्धन का कारण बनता है। यदि सभ्य पवित्र धन का ही अर्जन करते हैं तो वह राष्ट्र के लिये अमृत तुल्य होता है ।