Word-Meaning: - [१] (इत्था) = इस प्रकार (इदम्) = इस (रौद्रम्) = [सत्] रुद्र सम्बन्धी, सृष्टि के प्रारम्भ में वेदज्ञान प्राप्त करानेवाले प्रभु के (ब्रह्म) = स्तोत्र को क्रत्वा प्रज्ञान से (शच्यां अन्तः) = कर्मों के अन्दर (आजौ) = काम- क्रोधादि के साथ चलनेवाले अध्यात्म-संग्राम में, (यद्) = जब (उपस्थ) = इस नाभानेदिष्ठ के (पितरा) = मातृ- पितृ-स्थानभूत पृथिवीलोक और द्युलोक, शरीर व मस्तिष्क (क्राणा) = [कुर्वाणा] करनेवाले होते हैं। तब यह (गूर्तवचा:) = उद्यत वचनोंवाला होता है, ज्ञान की वाणियों को मस्तिष्क में धारण करनेवाला होता है और (मंहनेष्ठाः) = सदा दान में स्थितिवाला होता है, त्यागमय जीवनवाला होता है। [२] प्रभु के स्तोत्रों का उच्चारण ज्ञानपूर्वक ही होना चाहिये [क्रत्वा], प्रभु का उपासक क्रियामय जीवनवाला होता है, कर्म के द्वारा ही प्रभु का उपासन होता है [ शच्याम् अन्तः] । यह उपासक काम-क्रोध-लोभादि शत्रुओं के साथ सतत युद्ध में प्रवृत्त रहता है। इस उपासक का शरीर व मस्तिष्क दोनों प्रभु के उपासक बनते हैं, अर्थात् शरीर सम्बन्धी सब क्रियाओं को यह 'ऋत' पूर्वक करता है । ये सब क्रियाएँ सूर्य और चन्द्रमा की गति की तरह ठीक समय पर होती हैं। मस्तिष्क में यह असत्य विचारों को नहीं आने देता। इस प्रकार ऋत और सत्य का अपने जीवन से प्रतिपादन करता हुआ यह ब्रह्म का सच्चा उपासक होता है। इस उपासना के परिणामस्वरूप इसका जीवन ज्ञान व त्याग से परिपूर्ण होता है । [३] यह नाभानेदिष्ठ (पक्थे अहन्) = पक्तव्य दिन में (सप्त होतॄन्) = सात होताओं को (आपर्षत्) = [सर्वतः अपूरयत्] सब प्रकार से पूरित करता है। यह एक- एक दिन को इस योग्य समझता है कि उसने अपने शरीर, मन व बुद्धि का उनमें परिपाक करना है। एक-एक दिन 'अ-हन्' =न नष्ट करने योग्य है। प्रतिदिन अपना परिपाक करता हुआ यह 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम् ' = दो कान, दो नासिका छिद्र, दो आँखें व मुख रूप सातों होताओं को पूर्ण बनाने का प्रयत्न करता है, इनमें न्यूनताओं को नहीं आने देता ।
Connotation: - भावार्थ - हम प्रज्ञानपूर्वक कर्मों को करते हुए, वासनाओं के साथ संग्राम को करते हुए प्रभु का सच्चा स्तवन करें। ज्ञान व त्याग को अपनाएँ। 'कान, नासिका, आँख व मुख' सभी को न्यूनताओं से रहित बनाने का प्रयत्न करें।