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अ॒गस्त्य॑स्य॒ नद्भ्य॒: सप्ती॑ युनक्षि॒ रोहि॑ता । प॒णीन्न्य॑क्रमीर॒भि विश्वा॑न्राजन्नरा॒धस॑: ॥

English Transliteration

agastyasya nadbhyaḥ saptī yunakṣi rohitā | paṇīn ny akramīr abhi viśvān rājann arādhasaḥ ||

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Pad Path

अ॒गस्त्य॑स्य । नत्ऽभ्यः॑ । सप्ती॒ इति॑ । यु॒न॒क्षि॒ । रोहि॑ता । प॒णीन् । नि । अ॒क्र॒मीः॒ । अ॒भि । विश्वा॑न् । रा॒ज॒न् । अ॒रा॒धसः॑ ॥ १०.६०.६

Rigveda » Mandal:10» Sukta:60» Mantra:6 | Ashtak:8» Adhyay:1» Varga:24» Mantra:6 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:6


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (राजन्) हे राजन् ! (अगस्त्यस्य नद्भ्यः) पाप को त्याग दिया है जिसने, ऐसे निष्पाप के प्रशंसकों के लिए (रोहिता सप्ती युनक्षि) शुभ्र रोहण करनेवाले सभेश और सेनेश को युक्त कर (पणीन् न्यक्रमीः) व्यापारियों को स्वाधीन कर और उनको अपने व्यापार में प्रेरित कर (विश्वान्-अराधसः-अभि) सब उद्दण्डों को दबा-तिरस्कृत कर ॥६॥
Connotation: - राजा को चाहिए कि निष्पाप-पाकर्मसम्पर्क से रहित, परमात्मा की स्तुति प्रार्थना उपासना करनेवाले ऋषि-मुनियों के लिए विशेष न्यायव्यवस्था और रक्षाप्रबन्धार्थ सभेश और सेनेश को नियुक्त करे तथा व्यापारियों के लिए व्यापारार्थ प्रेरणा दे और राष्ट्र में जो उद्दण्ड हों, उन पर पूरा नियन्त्रण रखे ॥६॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

अगस्त्यस्य नद्भयः

Word-Meaning: - [१] अगस्त्य की स्वसा [= बहिन ] सुबन्धु की माता है। वही प्रस्तुत मन्त्रों की देवता है । अगं अचलं कूटस्थं प्रभुं स्त्यायति [स्त्यै शब्दे ] = अचल प्रभु के नामों का जो उच्चारण करता है वह 'अगस्त्य' है । वह चित्तवृत्ति जो कि प्रभु-स्तवन की ओर झुकती है वही अगस्त्य की स्वसा है, 'सु अस्' = अगस्त्य की स्थिति को उत्तम बनानेवाली है। यह 'अगस्त्य स्वसा' सुबन्धु को जन्म देती है, सुबन्धु, अर्थात् उत्तमता से मन को बाँधनेवाला । हे प्रभो ! आप इन (अगस्त्यस्य नद्भ्यः) = [नन्दपितृभ्य] अगस्त्य के आनन्दित करनेवाले, अगस्त्य के भगिनी पुत्रों, अर्थात् प्रभु- स्तवन की ओर चित्तवृत्ति को लगाकर चित्त के बाँधनेवालों के लिये (रोहिता) = तेजस्वी अथवा प्रादुर्भूत शक्तियोंवाले (सप्ती) = ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रिय रूप अश्वों को (युनक्षि) = इस शरीर रूप रथ में जोतते हैं । अर्थात् मनोनिरोध करनेवाले व्यक्तियों को आप उत्तम इन्द्रियाश्वों की प्राप्ति कराते हैं । इन्द्रियों ने तो विषयों का ग्रहण करना ही है, परन्तु यदि वे आत्मवश्य होती हुई विषयों में जाती हैं तो पवित्रता बनी रहती है। ऐसी स्थिति में मनुष्य की वृत्ति भौतिक नहीं बन जाती । [२] इसके विपरीत हे (राजन्) = संसार के शासक प्रभो ! आप (विश्वान्) = सब (अराधसः) = यज्ञादि उत्तम कर्मों को न सिद्ध करनेवाले (पणीन्) = बणिये की मनोवृत्तिवाले व्यवहारी लोगों को (अभि) = इस लोक व परलोक दोनों के दृष्टिकोण से (नि अक्रमी:) = नीचे कुचल देते हैं। धन का लोभ इन्हें यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त होने से रोकता है, सो ये इहलोक से भी जाते हैं, परलोक से भी ।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रभु-स्तवन की ओर चित्तवृत्ति को झुकायेंगे तो हमारे इन्द्रियाश्व उत्तम होंगे। केवल व्यवहारी पुरुष बन जायेंगे तो कुचले जाएँगे ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (राजन्) हे राजन् ! (अगस्त्यस्य नद्भ्यः) त्यक्तपापस्य प्रशंसकेभ्यः (रोहिता सप्ती युनक्षि) शुभ्रौ रोहणकर्त्तारौ प्रगतिशीलौ सभासेनेशौ योजय (पणीन् न्यक्रमीः) व्यापारिणः स्वाधीनीकुरु (विश्वान्-अराधसः-अभि) सर्वान् उद्दण्डान्-अभिभव ॥६॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - For the supporters and admirers of the simple, sinless, enlightened and disciplined ruling soul of the order, you harness two nimble bright forces of internal discipline and external defence, and, O refulgent ruler of the system, you control all the greedy, selfish, uncreative and uncommitted elements of the world order.