Word-Meaning: - [१] यदि एक व्यक्ति अस्वस्थ हो जाता है और उसके मन पर उस रोगमय का प्रभाव प्रकट होने लगता है तो एक उत्तम वैद्य उसके मन पर स्वास्थ्यकर प्रभाव डालने के लिये कहता है कि (मे) = मेरा (अयम्) = यह (हस्तः) = दायां हाथ (भगवान्) = भगवाला है, अद्भुत शक्तिवाला है [भग=stength] और (मे) = मेरा (अयम्) = यह वाम हस्त (भगवत्तर:) = और भी अधिक शक्तिशाली है । [२] यह मेरा हाथ क्या है । में (अयम्) = मेरा यह हाथ तो (विश्वभेषजः) = सब औषधोंवाला है, (अयं शिवा भिमर्शनः) = यह मंगल स्पर्शवाला है, यह छूते ही कल्याण करता है। इस प्रकार प्रेरणा देता हुआ वैद्य रोगी के मन को शुभ प्रभाव से समप्रून करने का प्रयत्न करता है और उसे स्वस्थ बनाता है।
Connotation: - भावार्थ - रोगी को वैद्य में विश्वास हो जाए तो उसका रोग शीघ्र ही दूर हो जाता है । सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से हुआ है कि हम ज्ञानी तेजस्वी स्तोता पुरुषों के सम्पर्क में चलते हुए उन जैसे ही बनें। [१] मन को काबू करके दीर्घजीवन व शुभ को प्राप्त करनेवाले हों, [८- १० ] शुद्ध वायु, सूर्य किरण सम्पर्क व गोदुग्ध हमें नीरोग बनाये। [११] वैद्य का हस्त-स्पर्श ही हमारे रोग को दूर भगा दे, [१२] हम सृष्टि के केन्द्रभूत यज्ञों के समीप हों, यज्ञशील बनें और अग्रिम सूक्त के ऋषि 'नाभानेदिष्ठ' बनें। [अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः] विचारशील होते हुए 'मानव' हों। यह मानव सात होताओं का पूरण करता है-