Word-Meaning: - [१] (वात:) = वायु मृत्यु को तेरे से (न्यग्) = नीचे (अववाति) = सुदूर ले जाती है। शुद्ध वायु का सेवन मृत्यु को तेरे से दूर करता है और इस प्रकार तेरा जीवन दीर्घ होता है। शुद्ध वायु सब रोगों का औषध बनता है और तुझे नीरोग बनाता है, नीरोग बनाकर यह मन को भी शान्ति देनेवाला होता है । शान्त मन दीर्घायुष्य का सर्वमहान् साधन है । [२] (सूर्यः) = यह प्रतिदिन उदय होनेवाला सूर्य भी मृत्यु को (न्यक्) = तेरे से नीचे ले जानेवाला होकर (तपति) = दीप्त होता है। सूर्य किरणों को छाती पर लेने से मृत्यु व रोग दूर होते हैं। [३] (अघ्न्या) = यह (अहन्तव्य गौ) = अपने दूध से हिंसा न होने देनेवाली गौ, (नीचीनम् दुहे) = मृत्यु को तेरे से नीचे ले जाती हुई दुहे दुग्ध का हमारे पात्रों पूरण करती है। यह गोदुग्ध का प्रयोग भी दीर्घायुष्य का प्रमुख साधन होता है। [४] इस प्रकार शुद्ध वायु के सेवन से, सूर्य किरणों को अपने शरीर पर लेने से तथा गोदुग्ध के प्रयोग से हम मृत्यु से दूर होते हैं । यहाँ मन्त्र में कहते हैं कि इनके प्रयोग से (ते रपः) = तेरा दोष (न्यग् भवतु) = नीचे जानेवाला होकर नष्ट हो जाए।
Connotation: - भावार्थ - दीर्घजीवन के लिये [क] शुद्ध वायु सेवन, [ख] सूर्य किरणों में उठना-बैठना तथा [ग] गोदुग्ध का प्रयोग आवश्यक हैं।