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ईशे॒ यो विश्व॑स्या दे॒ववी॑ते॒रीशे॑ वि॒श्वायु॑रु॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ । आ यस्मि॑न्म॒ना ह॒वींष्य॒ग्नावरि॑ष्टरथः स्क॒भ्नाति॑ शू॒षैः ॥

English Transliteration

īśe yo viśvasyā devavīter īśe viśvāyur uṣaso vyuṣṭau | ā yasmin manā havīṁṣy agnāv ariṣṭarathaḥ skabhnāti śūṣaiḥ ||

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Pad Path

ईशे॑ । यः । विश्व॑स्याः । दे॒वऽवी॑तेः । ईशे॑ । वि॒श्वऽआ॑युः । उ॒षसः॑ । विऽउ॑ष्टौ । आ । यस्मि॑न् । म॒ना । ह॒वींषि॑ । अ॒ग्नौ । अरि॑ष्टऽरथः । स्क॒भ्नाति॑ । शू॒षैः ॥ १०.६.३

Rigveda » Mandal:10» Sukta:6» Mantra:3 | Ashtak:7» Adhyay:6» Varga:1» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:1» Mantra:3


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यः-विश्वस्याः-देववीतेः-ईशे) जो अग्रणायक परमात्मा सकल दिव्यभोगप्राप्ति का स्वामित्व करता (विश्वायुः-व्युष्टौ-उषसः-ईशे) पूर्ण आयु जिससे-जिसकी शरण से स्तुति प्रार्थना उपासना द्वारा प्राप्त होती है, ऐसा वह परमात्मा बुद्धि के विकास में स्वामी है (यस्मिन्-अग्नौ) जिस परमात्मा में (मना-हवींषि) मननीय या मन से स्तुति प्रार्थनोपासनारूप वचन भेंट किये जाते हैं, ऐसा वह परमात्मा (अरिष्टरथः) उपासकों का अहिंसनीय रमणाधार है (शूषैः-आस्कभ्नाति) अपने बलों से दिव्यभोगों, उँची बुद्धि और जगत् को अपने में आश्रय देता है ॥३॥ 
Connotation: - अग्रणायक परमात्मा उपासकों के लिये दिव्यभोगों और प्रकाशमय बुद्धि को प्रदान करने में समर्थ है, उसकी स्तुति प्रार्थना उपासना करनेवालों को वह पूर्ण आयु देता है ॥३॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

अरिष्ट-रथ

Word-Meaning: - भगत मन्त्र के ही प्रकरण को ही आगे कहते हैं कि प्रभु की शरण में रहनेवाला वह है (यः) = जो (विश्वस्या:) = सम्पूर्ण (देववीतेः) = दिव्यगुणों की प्राप्ति का (ईशे) = ईश होता है, अर्थात् सब दिव्यगुणों को प्राप्त करने में समर्थ होता है । (उषसः व्युष्टौ) = उषः काल के उदित होने पर (विश्वायुः) = पूर्ण जीवनवाला बना हुआ यह 'त्रित' [मन्त्र का ऋषि] (ईशे) = उन दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिए सामर्थ्यवान् होता है। वस्तुतः यह त्रित उष:काल में अवश्य प्रबुद्ध होकर, पवित्र भावना से प्रभु के स्वागत के लिए उद्यत होता है। ये प्रभु प्रातः आते हैं और जब हम इनका स्वागत करते हैं तो ये हमें द्युमत्तम रयि = अत्यन्त ज्योतिर्मय धनों को प्राप्त कराते हैं । (यस्मिन् अग्नौ) = जिस प्रगतिशील व्यक्ति के जीवन में (मना) = मननीय, ज्ञान को बढ़ानेवाली, बुद्धि की मननशक्ति को दी करनेवाली (हवींषि आ) [हुतानि] = हवियाँ आहुत होती हैं, अर्थात् जो सदा त्याग पूर्वक उपभोग करता है, दूसरे शब्दों में अमृत [यज्ञशेष] का सेवन करता है वह (अरिष्टरथः) = अहिंसित शरीर वाला होता हुआ (शूषैः) = शत्रुओं के शोषक बलों से स्कभ्नाति= सब अशुभ वासनाओं के आक्रमणों को रोक देता है । अर्थात् सात्त्विक अन्न के सेवन से तथा यज्ञशेष के रूप में भोजन करने से इसकी बुद्धि व मनोवृत्ति भी बड़ी सात्त्विक बनी रहती हैं और यह वासनाओं से आक्रान्त नहीं होता ।
Connotation: - भावार्थ - सात्त्विक यज्ञशिष्ट भोजन हमें सब दिव्यगुणों की प्राप्ति के योग्य बनाता है ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यः-विश्वस्याः-देववीतेः-ईशे) योऽग्निरग्रणायकः परमात्मा सकलाया दिव्यभोगप्राप्तेः “देववीतये दिव्यानां भोगानां प्राप्तये” [यजु० १।२२ दयानन्दः] ईष्टे स्वामित्वं करोति-स्वामी खल्वस्ति (विश्वायुः-व्युष्टौ-उषसः-ईशे) विश्वं पूर्णमायुर्यस्मात् सः परमात्मा “विश्वमायुर्यस्मात् सः” [यजु० १।२२ दयानन्दः] तथा बुद्धेर्विकासे च स परमात्मा स्वामी खल्वस्ति (यस्मिन्-अग्नौ) यस्मिन्नग्रणायके परमात्मनि (मना-हवींषि) मननीयानि स्तुतिप्रार्थनोपासनवचनानि देयानि समर्प्याणि समर्प्यन्ते सः (अरिष्टरथः) उपासकानामहिंसनीयरमणाधारः (शूषैः-आस्कभ्नाति) स्वकीयबलैः “शूषं बलनाम” [निघ० २।९] सकलं दिव्यं सुखं ज्ञानं जगच्च स्वाश्रये धारयति ॥३॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni who rules over all the divine bliss and yajnic gifts of the world, who, life of the world, is the life giver and rules over lights of the dawn and maturation of wisdom, for whom oblations of yajna are offered into the fire with heart and soul, that Agni of the unviolated cosmic chariot sustains the universe by his omnipotent powers.