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अ॒यं स यस्य॒ शर्म॒न्नवो॑भिर॒ग्नेरेध॑ते जरि॒ताभिष्टौ॑ । ज्येष्ठे॑भि॒र्यो भा॒नुभि॑ॠषू॒णां प॒र्येति॒ परि॑वीतो वि॒भावा॑ ॥

English Transliteration

ayaṁ sa yasya śarmann avobhir agner edhate jaritābhiṣṭau | jyeṣṭhebhir yo bhānubhir ṛṣūṇām paryeti parivīto vibhāvā ||

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Pad Path

अ॒यम् । सः । यस्य॑ । शर्म॑न् । अवः॑ऽभिः । अ॒ग्नेः । एध॑ते । ज॒रि॒ता । अ॒भिष्टौ॑ । ज्येष्ठे॑भिः । यः । भा॒नुऽभिः॑ । ऋ॒षू॒णाम् । प॒रि॒ऽएति॑ । परि॑ऽवीतः । वि॒भाऽवा॑ ॥ १०.६.१

Rigveda » Mandal:10» Sukta:6» Mantra:1 | Ashtak:7» Adhyay:6» Varga:1» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:1» Mantra:1


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यस्य-अग्नेः-शर्मन्) जिस अग्रणायक परमात्मा के शरण में-उपासन में (अवोभिः) विविध रक्षणविधानों द्वारा (जरिता) स्तुतिकर्ता-उपासक जन (अभिष्टौ) निज अभिकाङ्क्षा-प्राप्ति हो जाने पर (एधते) समृद्ध हो जाता है अभ्युदय और मोक्ष पा लेता है, (सः-अयम्) वह यह परमात्मा (यः) जो (ज्येष्ठेभिः-भानुभिः) श्रेष्ठ भ्रान्तिराहित ज्ञानप्रकाशों से (परिवीतः) परिपूर्ण है, (विभावा) विशेष प्रकाशवान् (ऋषूणां पर्येति) मन्त्रसाक्षात्कर्ता अग्नि आदि परम ऋषियों को आरम्भ सृष्टि में सर्वभाव से प्राप्त होता है ॥१॥
Connotation: - परमात्मा की उपासनारूप शरण में उपासक की रक्षा करनेवाले परमात्मा के बहुत से प्रकार हैं, जिनसे उसकी कार्यसिद्धि हो जाने पर उपासक समृद्ध हो जाता है, अभ्युदय और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में अग्नि आदि परम ऋषियों के अन्दर साक्षात् प्राप्त होकर उन्हें निर्भ्रान्त ज्ञान प्रकाश-वेद को देता है ॥१॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रभु की शरण में

Word-Meaning: - (अयम्) = ये प्रभु (स) = वे हैं (यस्य अग्नेः) = जिस अग्रेणी प्रभु के (अवोभिः) = रक्षणों से (शर्मन्) = अपने गृह में अथवा आनन्द में [शर्म सुखानि] (एधते) = वृद्धि को प्राप्त करता है। प्रभु के रक्षण ही हमारा वर्धन करनेवाले हैं, प्रभु के रक्षण से दूर होते ही हम विनष्ट होते हैं । 'वृद्धि कौन प्राप्त करता है ?' इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि (जरिता) = स्तोता । प्रभु के गुणों के स्तवन करनेवाला वृद्धि को प्राप्त करता है । यह गुणस्तवन उसके सामने सदा एक ऊँचे लक्ष्य को उपस्थित करता है । (अभिष्टौ) = [यागे कृते] यज्ञों के होने पर ही हम वृद्धि को प्राप्त करते हैं। प्रभु का स्तवन करते हुए, प्रभु के आदेशानुसार, जब हम यज्ञों में प्रवृत्त होते हैं तभी हमारी वृद्धि होती है । वृद्धि को वह प्राप्त करता है (यः) = जो कि (ज्येष्ठेभिः भानुभिः) = उत्कृष्ट ज्ञानदीप्तियों को प्राप्त करने के हेतु से (ऋभूणां) = तत्त्व द्रष्टा ज्ञानियों को (पर्येति) = परिक्रमा करता है, उनको आदर देता हुआ उनके चरणों में उपस्थित होता है । एवं यह 'स्तोता, यज्ञशील, ज्ञानियों का उपासक' वृद्धि को प्राप्त करता है, और (परिवीतः) = ज्ञान से परिवृत हुआ हुआ, ज्ञानियों के सम्पर्क से खूब ज्ञान को प्राप्त हुआ- हुआ यह (विभावा) = विशिष्ट ही दीप्ति वाला होता है। इस ब्रह्मनिष्ठ पुरुष की भान्ति अद्भुत ही होती है, यह प्रभु के तेज के अंश से चमक रहा होता है, प्रभु-सा बन गया होता है [ब्रह्म इव] ।
Connotation: - भावार्थ- हम स्तोता - यज्ञशील ज्ञानियों के सम्पर्क में रहनेवाले, ज्ञान से परिवृत बनकर प्रभु के रक्षणों से निरन्तर वृद्धि को प्राप्त करते हैं ।

BRAHMAMUNI

पूर्ववत्।

Word-Meaning: - (यस्य-अग्नेः-शर्मन्-अवोभिः) यस्य ह्यग्ने परमात्मनः शरणे-उपासने सति विविधरक्षणप्रकारैः (जरिता) स्तुतिकर्त्ता जनः “जरिता स्तोतृनाम” [निघ० ३।१६] (अभिष्टौ) निजाभिकाङ्क्षाप्राप्तौ सत्याम् (एधते) समृद्धो भवति (सः-अयम्) सोऽयं परमात्माऽस्ति (यः) यश्च (ज्येष्ठेभिः-भानुभिः) श्रेष्ठैर्निर्भ्रान्तैर्ज्ञानप्रकाशैः “भानुभिः-विद्याप्रकाशैः” [यजु० १२।३२ दयानन्दः] (परिवीतः) परिपूर्णः (विभावा) विशिष्टप्रकाशवान् (ऋषूणां पर्येति) ऋषून्-ऋषीन्-अग्न्यादीन् परमर्षीन् “ऋषूणां मन्त्रार्थविदां व्यत्ययेन-इकारस्थान उत्वं षष्ठी च [ऋ० १।२५।१ दयानन्दः] सर्वभावेन प्राप्नोति ॥१॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - This is that Agni under whose shelter with all protection the celebrant rises towards the attainment of total fulfilment and who, self-refulgent and gracious, infinitely abundant, transcends all with the highest and most blazing lights of divinity.