Go To Mantra
Viewed 394 times

प्र ता॒र्यायु॑: प्रत॒रं नवी॑य॒ स्थाता॑रेव॒ क्रतु॑मता॒ रथ॑स्य । अध॒ च्यवा॑न॒ उत्त॑वी॒त्यर्थं॑ परात॒रं सु निॠ॑तिर्जिहीताम् ॥

English Transliteration

pra tāry āyuḥ prataraṁ navīya sthātāreva kratumatā rathasya | adha cyavāna ut tavīty artham parātaraṁ su nirṛtir jihītām ||

Mantra Audio
Pad Path

प्र । ता॒रि॒ । आयुः॑ । प्र॒ऽत॒रम् । नवी॑यः । स्थाता॑राऽइव । क्रतु॑ऽमता । रथ॑स्य । अध॑ । च्यवा॑नः । उत् । त॒वी॒ति॒ । अर्थ॑म् । प॒रा॒ऽत॒रम् । सु । निःऽऋ॑तिः । जि॒ही॒ता॒म् ॥ १०.५९.१

Rigveda » Mandal:10» Sukta:59» Mantra:1 | Ashtak:8» Adhyay:1» Varga:22» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:1


BRAHMAMUNI

इस सूक्त में भिन्न-भिन्न देवतावाचक शब्दों से अनेक प्रयोजन हैं−संयम से गृहस्थचालन, अन्नसंग्रह, शीघ्र बुढ़ापा और मौत न आए, इस प्रकार आचरण करना आदि-आदि।

Word-Meaning: - (क्रतुमता) गृहस्थ यज्ञवाले गृहस्थ जन के द्वारा (नवीयः प्रतरम्-आयुः प्र तारि) उत्पन्न हुए बालक की अतिनवीन बढ़ने योग्य आयु बढ़ानी चाहिए (रथस्य स्थातारा-इव) जैसे रथ के अन्दर बैठनेवाले शुभ यात्रा को करते हैं, उसी भाँति गृहस्थ रथ में स्थित अपनी शुभ यात्रा करें (अध) अनन्तर (च्यवानः परातरम्-अर्थम्-उत्तवीति) जैसे कोई यात्रा करता हुआ अत्यन्त दूर के स्वलक्ष्य को भी प्राप्त करता है (निर्ऋतिः सुजिहीताम्) जीवनयात्रा के मध्य आई कृच्छ्र आपत्ति भी सुगमता से उन्हें छोड़ दे अर्थात् गृहस्थ आश्रम में आये दुःख संकट को सुगमता से सहन कर सकें, ऐसे बरतें ॥१॥
Connotation: - गृहस्थ आश्रम में रहते हुए स्त्री-पुरुष गृहस्थ को ऐसे चलाएँ, जैसे कि कोई रथस्थ यात्री अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। गृहस्थ का लक्ष्य है धर्माचरण करते हुए उत्तम सन्तान का उत्पन्न करना, उसकी आयु को बढ़ाना और उसे गुणवान् बनाना ॥१॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

क्रतुमान् सारथि

Word-Meaning: - [१] गत सूक्त के अनुसार मनोनिरोध के होने पर (आयुः) = जीवन (प्रतरम्) = [ प्रवृद्धतरं] प्रवृद्धतर, दीर्घ व (नवीयः) = नवतर - यौवन से युक्त, न जीर्ण हुआ हुआ स्तुति के योग्य [ नु स्तुतौ ] (प्रतारि) = बढ़ता है । हमारा जीवन दीर्घ व स्तुत्य [प्रशस्त] होता है । हम उसी प्रकार जीवन में बढ़ते हैं (इव) = जैसे कि (रथस्य स्थातारः) = रथ पर स्थित होनेवाले पति-पत्नी क्रतुमता उत्तम प्रज्ञान व कर्मवाले सारथि से बढ़ते हैं । इस शरीर रथ में आत्मा रथी है, पति, बुद्धि उसकी पत्नी है और प्रभु सारथि हैं, वे पूर्ण प्रज्ञा व कर्मवाले हैं । [२] (अध) = अब प्रभु को रथ का सारथि बनाने पर, (च्यवानः) = सब अशुभों से पृथक् होता हुआ (अर्थम्) = वाञ्छनीय धर्म, अर्थ, काम व मोक्षरूप पुरुषार्थों को (उत्तवीति) = बढ़ाता है। और इस प्रार्थना के योग्य होता है कि (निर्ऋतिः) = दुर्गति (परातरम्) = बहुत ही दूर (सुजिहीताम्) = पूर्णतया चली जाए। दुर्गति से हम दूर हों । प्रभु जब हमारे रथ के सारथि होते हैं तब दुर्गति का वस्तुतः प्रश्न ही नहीं रहता। अहंकार-वश जब हमें रथ के स्वयं संचालन का गर्व हो जाता है तो हम भटक जाते हैं और दुर्गति का शिकार होते हैं।
Connotation: - भावार्थ- हमारा जीवन दीर्घ व स्तुत्य हो । प्रभु हमारे रथ के सारथि हों और हम दुर्गति से दूर रहें।

BRAHMAMUNI

अत्र सूक्ते भिन्नभिन्नदेवतावाचकशब्देभ्योऽनेके लाभा ग्राह्याः, यथा संयमेन गृहस्थचालनं, स्थायित्वमन्नस्य, शीघ्रं जरामरणे न स्यातामिति वार्तिकम्।

Word-Meaning: - (क्रतुमता) गृहस्थयज्ञवता जनेन गृहस्थेन (नवीयः-प्रतरम्-आयुः प्रतारि) नवतरं जातस्य बालस्य प्रकृष्टतरं प्रवर्धनयोग्यमायुः प्रवर्धयितव्यम् (रथस्य स्थातारा-इव रथस्य स्थातारौ-यथा रथे तिष्ठन्तौशुभां यात्रां वहतस्तद्वद्गृहस्थे तिष्ठन्तौ स्त्रीपुरुषौ शुभयात्रां वहतः (अध) अथ-अनन्तरम् (च्यवानः परातरम्-अर्थम्-उत्तवीति) यथा कश्चिद् गच्छन् “च्यवानं गच्छन्तम्” [ऋ० १।११७।१३ दयानन्दः] दूरतरं स्वलक्ष्यं प्राप्नोति (निर्ऋतिः सुजिहीताम्) जीवनयात्राया मध्ये खल्वागता कृच्छ्रापत्तिः सुगमतया त्यजतु दूरं गच्छतु वा ॥१॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Let new life and new initiative rise and advance higher and higher as the dynamic master of the chariot constantly moves forward and as the progressive pioneer achieves his goal and moves higher and higher. Let want and adversity fall off and depart far and farther.