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व॒यं सो॑म व्र॒ते तव॒ मन॑स्त॒नूषु॒ बिभ्र॑तः । प्र॒जाव॑न्तः सचेमहि ॥

English Transliteration

vayaṁ soma vrate tava manas tanūṣu bibhrataḥ | prajāvantaḥ sacemahi ||

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Pad Path

व॒यम् । सो॒म॒ । व्र॒ते । तव॑ । मनः॑ । त॒नूषु॑ । बिभ्र॑तः । प्र॒जाऽव॑न्तः । स॒चे॒म॒हि॒ ॥ १०.५७.६

Rigveda » Mandal:10» Sukta:57» Mantra:6 | Ashtak:8» Adhyay:1» Varga:19» Mantra:6 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:6


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सोम) हे शान्तस्वरूप परमात्मन् ! (वयं तव व्रते) हम तेरे नियम या आदेश में अर्थात् वेदशासन में वर्तमान हुए (तनूषु मनः-बिभ्रतः) इन्द्रियों में मन को लगाते हुए-उन्हें मन के अनुकूल संयम में चलाते हुए (प्रजावन्तः सचेमहि) प्रशस्त इन्द्रियवाले तेरा सेवन करें-तेरी उपासना करें ॥६॥
Connotation: - परमात्मा की उपासना करने के लिए मनुष्य को संयमी होना चाहिए और वेदानुसार धर्मचर्या पर चलना चाहिए ॥६॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सोम का व्रत

Word-Meaning: - [१] पिछले मन्त्र में व्रतों में मन को लगाने का उल्लेख है। उन्हीं व्रतों में एक 'सोम' का भी व्रत है। शरीर में सोमशक्ति के रक्षण का निश्चय करना ही 'सोम का व्रत' है। इसे धारण करनेवाला अवश्य ही मनोनिरोध के लिये यत्नशील होता है । (वयम्) = हम हे (सोम) = सोमशक्ते ! (तव व्रते) = तेरे व्रत में, अर्थात् तेरे रक्षण का निश्चय करने पर (मनः) = मन को (तनूषु) = शरीरों में ही (विभ्रतः) = धारण करते हुए, (प्रजावन्तः) = उत्कृष्ट विकासवाले होकर (सचेमहि) = प्रभु के साथ संगत हों । [२] जो भी सोम को शरीर में ही सुरक्षित करने का निश्चय करता है वह मन को विषयों में भटकने से रोकता ही है, मन को अपने अन्दर ही निरुद्ध करने के लिये यत्नशील होता है । [३] मन को निरुद्ध कर सकने पर हम विविध शक्तियों के विकासवाले होते हैं, शक्तियों का विकास हमें प्रभु प्राप्ति के योग्य बनाता है ।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण का व्रत मनोनिरोध से पूर्ण होता है। मनोनिरोध से शक्तियों का विकास होकर प्रभु की प्राप्ति होती है । सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से हुआ है कि हम पथ-भ्रष्ट न हों, [१] इसके लिये सोम के रक्षण का व्रत धारण करें, यह व्रत मनोनिरोध से ही पूर्ण होगा, [२] इस दूर-दूर जानेवाले मन को हम लौटाकर उत्तम निवास व जीवनवाले बनें-

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सोम) हे शान्तस्वरूप परमात्मन् ! (वयं तव व्रते) वयं तव नियमे-आदेशे वेदशासने वर्तमानाः (तनूषु मनः बिभ्रतः) इन्द्रियेषु मनो धारयन्तः, तानि मनोऽनुकूले चालयन्तः (प्रजावन्तः सचेमहि) प्रशस्तेन्द्रियवन्तः “इन्द्रियं प्रजाः” [काठ० २७।२] त्वा सेवेमहि उपास्महे ॥६॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Soma, lord of peace and enlightenment, we pray that, holding our mind and senses in body in good health within your law and discipline and blest with noble progeny, we may live a happy life dedicated to you.