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पुन॑र्नः पितरो॒ मनो॒ ददा॑तु॒ दैव्यो॒ जन॑: । जी॒वं व्रातं॑ सचेमहि ॥

English Transliteration

punar naḥ pitaro mano dadātu daivyo janaḥ | jīvaṁ vrātaṁ sacemahi ||

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Pad Path

पुनः॑ । नः॒ । पि॒त॒रः॒ । मनः॑ । ददा॑तु । दैव्यः॑ । जनः॑ । जी॒वम् । व्रात॑म् । स॒चे॒म॒हि॒ ॥ १०.५७.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:57» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:1» Varga:19» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:5


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (पितरः) हे पालक जनो ! (दैव्यः जनः-नः-मनः पुनः-ददातु) ऊँचा विद्वान् आचार्य हमारे मनोबल-ज्ञान को हमें बार-बार प्रदान करे-बढ़ाये (जीवं व्रातं सचेमहि) जीवमात्र-जीवगण को सेवन करें-यथायोग्य उपयोग में लावें ॥५॥
Connotation: - पारिवारिक जनों को चाहिए कि सन्तान को ऊँचे आचार्य से ऐसी शिक्षा दिलाएँ, कि प्राणिमात्र के प्रति यथोचित व्यवहारलाभ ग्रहण कर सके ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

पितर व दैव्य जन

Word-Meaning: - [१] (पितरः) = ज्ञान प्रदान के द्वारा रक्षणात्मक कार्यों में लगे हुए पितर (नः) = हमें (पुनः) = फिर से (मनः) = मन को (ददातु) = दें । पितरों के सम्पर्क में आकर उनके जीवन के अनुसार अपने जीवन को बनाते हुए हम मन को भटकने से रोक सकें। (दैव्यः जनः) = देव की ओर चलनेवाले लोग भी हमें फिर से मन को प्राप्त कराएँ । उस देव [प्रभु] की ओर चलना मन को निरुद्ध व उत्तम बनाने का सुन्दर साधन है । प्रभु के स्तोत्रों का जप मनोनिरोध का साधन बनता है। प्रकृति की ओर जाने से मन अधिकाधिक भटकता है और प्रभु की ओर चलने से यह शान्त होता है । [२] मन को निरुद्ध करके हम (जीवं व्रातम्) = जीवन के साधनभूत व्रतसमूह को (सचेमहि) = अपने साथ संगत करें। व्रत में मन को लगाएँगे तो यह भटकने से रुकेगा ही। ये व्रत हमारे जीवन को सुन्दर भी बनानेवाले होंगे।
Connotation: - भावार्थ - पितरों व देव लोगों के अनुगमन से मन निरुद्ध होता है। इस मन को हम व्रतों में लगाएँ, ये व्रत जीवन को उत्तम बनाते हैं ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (पितरः) हे पालकजनाः ! (दिव्यः-जनः-नः मनः पुनः ददातु) विद्वज्जनोऽस्माकं मनोऽन्तःकरणं पुनः पुनः ददातु ज्ञानप्रदानेन प्रवर्धयतु (जीवं व्रातं सचेमहि) जीवमात्रं सेवेमहि-उपयुक्तं कुर्याम ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - May our parents, seniors, the spirit and wisdom of our ancestors, and men of divine wisdom inspire our mind and spirit again and again, continuously for refreshment and energy, so that we may live a life of discipline and holiness.