शक्ति व प्रेरणा की प्राप्ति
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार 'आत्मज्योति में प्रवेश करने पर हम कैसे बनते हैं ?' उसका चित्रण करते हुए कहते हैं कि तू (वाजिनेन)[वाज + इन] = सब शक्तियों के स्वामी उस प्रभु से (वाजी असि) = शक्तिशाली बनता है। प्रभु में प्रवेश करने पर हमारी शक्ति उसी प्रकार बढ़ती है जैसे कि लोहे की शलाका अग्नि में प्रविष्ट होकर अग्नि की शक्ति को प्राप्त करती है। इस शक्ति को प्राप्त करके तू (सुवेनी:) = [सुष्ठु कान्तः] 'उत्तम सुन्दर तेजस्वी' प्रतीत होता है । [२] प्रभु में प्रवेश करने पर यहाँ शक्ति प्राप्त होती है, वहाँ प्रभु से हमें उत्तम प्रेरणा भी प्राप्त होती है और (सुवितः) = उत्तम प्रेरणा को प्राप्त हुआ-हुआ तू (स्तोमम्) = स्तुति को (गाः) = प्राप्त होता है, तू प्रभु का स्तवन करनेवाला बनता है । (सुवितः) = उत्तम प्रेरणा को प्राप्त हुआ हुआ तू (दिवं गाः) = ज्ञान की ज्योति को प्राप्त होता है । (सुवितः) = उस उत्तम प्रेरणा को प्राप्त करनेवाला तू (प्रथमा सत्या धर्म) = मुख्य सत्य धर्मों को (अनुगाः) = पालन करनेवाला होता है। वेद में यज्ञ के अन्तर्गत 'देवपूजा-संगतिकरण व दान' इनको मुख्य धर्म कहा है। प्रभु की प्रेरणा को प्राप्त करनेवाला व्यक्ति 'माता, पिता, आचार्य व अतिथि' आदि देवों का पूजन करता है, परस्पर प्रेम से मिलकर चलनेवाला होता है, छोटों को सदा देनेवाला, उसपर अनुग्रह की वृत्तिवाला होता है। (सुवितः) = उत्तम प्रेरणा को प्राप्त हुआ हुआ यह (देवान्) = दिव्यगुणों को प्राप्त करनेवाला होता है और (सुवितः) = सदा सुप्रेरित हुआ हुआ पत्म मार्ग का (अनु) [ गाः ] = अनुसरण करता है। मार्ग का उल्लेख प्रस्तुत मन्त्र में ही 'स्तोमं दिवं प्रथमा सत्या धर्म व देवान्' इन शब्दों द्वारा व्यक्त रूप से किया गया है। स्तुति, ज्ञान, देवपूजा, संगतिकरण, दान व दिव्यगुणों का अर्जन ही मार्ग है, इसी मार्ग पर हमें चलना है।
Connotation: - भावार्थ- आत्मज्योति की ओर चलने से शक्ति प्राप्त होगी तथा उत्तम प्रेरणा को प्राप्त करके हम मार्ग का अनुसरण करेंगे। मार्ग यह है [क] प्रभुस्तवन, [ख] ज्ञान प्राप्ति, [ग] देवपूजा, संगतिकरण, दान, [ग] दैवी सम्पत्ति का अर्जन ।