Word-Meaning: - [१] सब देव परस्पर प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि 'अक्षानहः' [अक्षेषु नह्यान्] = शरीर रूप रथ के अक्षों में बाँधने व जोतने के योग्य इन इन्द्रियाश्वों को नह्यतन = बाँधो व जोतो । उत-और सोम्याः = सौम्य 'शान्त' मन से बनी हुई रशनाः - लगामों को इष्कृणुध्वम् सुसंस्कृत करो । उत=और आपिंशत= बुद्धि रूप सारथि को ज्ञान के नक्षत्रों से अलंकृत करो । इन्द्रियाँ शरीर रूप रथ के वहन में लगी हुई हों, अर्थात् सब इन्द्रियाँ अपना-अपना कार्य उत्तमता से कर रही हों । मनरूपी लगाम सुसंस्कृत हो । मन का परिष्कृत होना ही लगाम की उत्तमता है। बुद्धि रूप सारथि का ज्ञान से भूषित होना आवश्यक है । [२] अष्टाबन्धुरम्= [बन्धुर = seat] 'भूमि- आपः - अनल, वायु-ख [आकाश] मन, बुद्धि व अहंकार' ये आठ ही इस शरीर रथ में बैठने के स्थान हैं अथवा यह शरीर - रथ इन आठ के बन्धनवाला है। इस अष्टाबन्धुर रथम् - रथ को अभितः - सांसारिक अभ्युदय की ओर तथा अध्यात्म निःश्रेयस की ओर इस प्रकार दोनों ओर वहत - ले चलो। इस प्रकार इस रथ का दोनों ओर ले चलना वह उपाय है येन- जिससे देवासः - देववृत्ति के लोग प्रियं अभि-उस प्रिय प्रभु की ओर अनयन्- अपने को ले जाते हैं व प्राप्त कराते हैं । प्रभु की आराधना इसी में है कि हम प्रभु से दिये गये इस रथ को ऐहिक व पारलौकिक कल्याण के लिये साधनरूप समझते हुए अभ्युदय व निःश्रेयस को सिद्ध करें। धन व कर्म दोनों की ओर हमारा शरीर अग्रसर हो ।
Connotation: - भावार्थ - हम इस शरीर रथ को धन व धर्म दोनों की ओर ले चलते हुए प्रिय प्रभु को प्राप्त करें।