Word-Meaning: - [१] (त्रीणि शता) = तीन सौ (त्री सहस्राणि) = तीन हजार (त्रिंशत् च) = और तीस (नव च) = और नौ, अर्थात् ३३३९ (देवाः) = देव (अग्निम्) = उस अग्रणी प्रभु को (असपर्यन्) = पूजते हैं। ब्रह्माण्ड में जितने देव हैं वे सब के सब शरीर में भी छोटे रूप में रहते हैं 'सर्वा ह्यस्मिन् देवता गावो गोष्ठ इवासते'। सब देवों के निवास के कारण पुरुष 'देव' ही बन जाता है। इन देवों के अन्दर स्थित सब देव उस प्रभु का पूजन करनेवाले होते हैं। इनकी आँखें [सूर्य] प्रकृति में प्रभु की महिमा को देखती हैं। कान [दिशाएँ] पक्षियों के कलरवों में प्रभु की महिमा के गायन को सुनते हैं । वाणी [= अग्नि] प्रभु के गुणों का गान करती है। शरीर के अंग-प्रत्यंगों में स्थित सब देव प्रभु का पूजन करते हैं। [२] (घृतैः) = मलों के क्षरण व ज्ञान की दीप्ति से वे देव (औक्षन्) = अपने को सिक्त करते हैं। (अस्या) = इस प्रभु के लिये (बर्हिः) = वासनाओं का जिसमें से उद्बर्हण कर दिया गया है ऐसे हृदय के आसन को (अस्तृणन्) = बिछाते हैं और (आत् इत्) = इसके ठीक बाद (होतारम्) = सब हव्य पदार्थों के देनेवाले प्रभु को (न्यसादयन्त) = इस हृदय के आसन पर बिठाते हैं। प्रभु-पूजन के लिये आवश्यक है कि - [क] शरीर को निर्मल व नीरोग बनाया जाए [ क्षरण], [ख] मस्तिष्क को ज्ञान से दीप्त किया जाए [दीप्ति], [ग] हृदय को वासना शून्य निर्मल किया जाए [बर्हिः ] स्वस्थ शरीर कर्मकाण्ड को ठीक से करेगा, दीप्त मस्तिष्क ज्ञानकाण्ड का धारण करेगा व निर्मल हृदय उपासनामय होगा ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु-पूजन के लिये शरीर मस्तिष्क व मन तीनों को ठीक करना होता है। वस्तुतः इस त्रिलोकी में स्थित सभी देव प्रभु का पूजन करते हैं [शरीर = पृथिवीलोक, हृदय = अन्तरिक्षलोक, मस्तिष्क= द्युलोक] । इन देवों से प्रभु-पूजन होने पर ही हम सच्चे देव बनते हैं । सूक्त के प्रारम्भ में कहा है कि देव प्रभु का होतृरूपेण वरण करते हैं, [१] समाप्ति पर भी यही कहते हैं कि देव इस होता प्रभु को हृदय में आसीन करते हैं, [२] देव प्रभु को देखते हुए कहते हैं कि-