Word-Meaning: - [१] (अयम्) = यह (यः) = जो (होता) = सब पदार्थों को देनेवाला प्रभु है (स) = वह (उ) = निश्चय से (यमस्य) = संयमी पुरुष का ही (किः) = [कृ= to fill with ] धनों से भरनेवाला है । (यत्) = जब (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (समञ्जन्ति) = अपने जीवनों को सद्गुणों से अलंकृत करते हैं तो ये होता प्रभु ही (कम्) = आनन्द को (अपि) = भी (ऊहे) = प्राप्त कराते हैं । देवों को, देववृत्तिवाले पुरुषों को, प्रभु कृपा से आनन्द की प्राप्ति होती है । [२] वह प्रभु (अहरहः) = प्रतिदिन जायते प्रकट होते हैं, प्रतिदिन प्रादुर्भूत होनेवाले सूर्य में प्रभु की महिमा दिखती है । और (मासि मासि) = प्रत्येक मास में अथवा [मास् moon] चन्द्रमा में वे प्रभु प्रकट होते हैं। दिन का देवता सूर्य है, दिन का निर्माण इस सूर्य पर ही निर्भर करता है, इस सूर्य में तो वे प्रभु दिखते ही हैं। महीनों को बनानेवाले इस चन्द्रमा में भी वे प्रभु प्रकट होते हैं। (अथ) = इस प्रकार पूर्णरूप से (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (हव्यवाहम्) = हव्यों को प्राप्त करानेवाले प्रभु को (दधिरे) = धारण करते हैं। प्रभु का हृदय में ध्यान करते हैं, दिन में सूर्य- दर्शन उन्हें प्रभु का स्मरण कराता है तो रात्रि में चन्द्रमा उन्हें प्रभु प्रवण करनेवाला होता है। वे देव यही अनुभव करते हैं कि जो प्रभु सूर्य को दीप्ति देते हैं, जो चन्द्रमा को ज्योत्स्ना प्राप्त कराते हैं, वे ही प्रभु हमें भी सब हव्य पदार्थों व आनन्द को देनेवाले हैं।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु संयमी पुरुष को सब आवश्यक धन प्राप्त कराके उसके जीवन को आनन्दमय करते हैं।