अकाम उपासकों का प्रभु-दर्शन
Word-Meaning: - [१] अग्नि अपने छिपने के कारण पर प्रकाश डालता हुआ काव्यमय भाषा में कहता है कि हे (वरुण) = द्वेष का निवारण करनेवाले पुरुष ! (अहम्) = मैं (होत्राद्) = हवि को प्राप्त कराने रूप कर्म से, प्रतिक्षण देने के कर्म से (बिभ्यत्) = डरता हुआ (आयम्) = यह छिपने के स्थान पर आ गया हूँ । मैंने योगमाया से अपने को आवृत कर लिया है। जैसे एक ४-५ साल का बालक पिताजी को देखता है और पैसे माँगता है, इसी प्रकार हम भी उस प्रभु का उपासन करते हैं और 'प्रजा-पशु-अन्नाद्य' आदि की याचना करने लग जाते हैं। प्रभु कहते हैं कि इस हर समय याचन की प्रथा से तो मैं भी तंग आ गया और मैंने अपने को छिपा लिया, जिससे (देवा:) = देव (मा) = मुझे (अत्र) = इस देने के काम में (न इत् एव) = नांही (युनजन्) = युक्त कर दें। इस सारे वर्णन का भाव इतना ही है कि उत्तम उपासना वही है जो अकाम होकर की जाए। [२] प्रभु कहते हैं कि (एतं अर्थम्) = इस बात को तो (अहं अग्नि:) = मैं अग्नि (न चिकेत) = भूल ही गया कि (तस्य मे) = उस छिपने की कोशिष करनेवाले मेरे (तन्वः) = शरीर (बहुधा) = नाना प्रकार से (निविष्टाः) = निविष्ट हैं । पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक आदि सभी तो मेरे शरीर हैं, सो मेरे छिपने का सम्भव ही कैसे है ? देववृत्ति के लोग तो एक-एक कण में मेरी महिमा को देखते हैं, सो ना तो मैं उन से छिप सकता हूँ और नांही उनकी याचनाओं को ठुकरा सकता हूँ ?
Connotation: - भावार्थ - प्रभु अज्ञानियों से ही ओझल हैं, ज्ञानियों के लिये तो कण-कण में प्रत्यक्ष हो रहे हैं।