Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्र) = ज्ञान रूप परमैश्वर्यवाले प्रभो ! (त्वम्) = आप (ब्रह्मणा) = ज्ञान के दृष्टिकोण से (महान्) = सबसे बड़े (भुवः) = हैं, आपका ज्ञान निरतिशय है, ज्ञान की आप चरमसीमा ही हैं। [२] (विश्वेषु सवनेषु) = सब यज्ञों के अन्दर आप ही (यज्ञियः) = पूजनीय होते हैं। आपकी कृपा से ही यज्ञ परिपूर्ण होते हैं । वस्तुतः आप ही सब यज्ञों के होता हैं । [३] (विश्वस्मिन् भरे) = सब संग्रामों में (नृन्) = शत्रुओं के नेतृ पुरुषों को आप ही (च्यौत्न:) = स्वस्थन से विचलित करनेवाले बल से युक्त हैं। आपकी शक्ति से शक्ति सम्पन्न होकर ही हम शत्रुओं का पराजय कर पाया करते हैं । [४] हे (विश्वचर्षणे) = सर्वद्रष्टः = सबका ध्यान करनेवाले प्रभो ! (च) = और आप ही (ज्येष्ठ मन्त्रः) = सर्वश्रेष्ठ मन्त्र हैं। [क] कार्यों की सिद्धि के लिये अन्य मन्त्र तो पता नहीं कि सफलता प्राप्त कराते हैं या नहीं, यह प्रभु का स्मरण मनुष्य को अवश्य सफल बनाता है। [ख] अथवा आप ही सर्वश्रेष्ठ मननीय वस्तु हो । प्रकृति व जीव का ज्ञान भी आवश्यक है, परन्तु आपका मनन सर्वोपरि है। प्रकृति व जीव का ज्ञान हमें धन प्राप्त कराता है, तो आपका मनन हमें उस धन से धन्य बनाता है, अन्यथा यही धन हमारे निधन का कारण हो जाता है।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु सर्वज्ञ हैं, सब यज्ञों के होता हैं, संग्रामों में विजय प्राप्त करानेवाले हैं, सब सफलताओं के मन्त्र हैं । अथवा वे प्रभु सर्वोपरि मन्तव्य सत्ता हैं ।