Word-Meaning: - [१] (अहम्) = मैं (पिता इव) = जैसे पिता पुत्र की इष्ट प्राप्ति के लिये यत्न करता है इसी प्रकार (कुत्साय) = वासनाओं का संहार करनेवाले के लिये अभिष्टये इष्ट प्रापण के लिये वेतसून् (तुग्रं स्मदिभं च) = वेतसुओं को, तुग्र को तथा स्मदिभ को (रन्धयम्) = नष्ट करता हूँ, इनको वशीभूत करता हूँ । 'वेद-सू' शब्द का अर्थ है, 'कामना को जन्म देनेवाला' [वी= to dlsire वेत=wish सू=जन्म देना] हमारे में एक इच्छा उत्पन्न होती है, वह पूर्ण होती है तो नयी इच्छा उत्पन्न हो जाती है, यही लोभ है। लोभ में इच्छाओं का अन्त नहीं होता । 'तुग्रम्' शब्द 'तुज हिंसायाम्' से बनकर हिंसक वृत्ति व क्रोध को संकेत करता है । 'स्मदिभ' शब्द 'स्मत् = श्रेष्ठ के लिये इभ-हाथी के समान' इस अर्थ को कहता हुआ उस 'काम-वासना' का सूचक है, जो कि अच्छी से अच्छी वस्तु को खराब कर देती है। हाथी कदली-स्तम्भ को उखाड़ फेंकता है, इसी प्रकार 'काम' श्रेष्ठता को उखाड़नेवाला है। प्रभु इन 'वेतसू, तुग्र व स्मदिभ' को, लोभ, क्रोध व काम को नष्ट करके कुत्स के जीवन को इष्ट की प्राप्तिवाला व सुन्दर बनाते हैं । [२] प्रभु कहते हैं कि (अहम्) = मैं (यजमानस्य) = यज्ञशील पुरुष के (राजनि) = [राजनार्थम्] दीपन के निमित्त (भुवम्) = होता हूँ (यत्) = जब कि (तुजये न) = पुत्र के लिये पिता की तरह (धृषे) = शत्रुओं के धर्षण के लिये (प्रिया) = प्रिय वस्तुओं को लोभ के विपरीत 'सन्तोष' को, क्रोध के विपरीत 'शान्ति' को और काम के विपरीत 'प्रेम' को (प्रभरे) = उस यजमान में भरता हूँ इस यजमान के जीवन को 'सन्तोष, शान्ति व प्रेम' सुन्दर बनानेवाले होते हैं। इन प्रिय गुणों से उस यजमान का जीवन दीप्त हो उठता है ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु कृपा से हमारे जीवन में लोभ का स्थान 'सन्तोष' ग्रहण करे, क्रोध के स्थान में 'शान्ति' हो और काम का स्थान 'प्रेम' ले ले ।