Word-Meaning: - [१] हमारे जीवन के महान् शत्रु 'काम-क्रोध, लोभ-मोह व मद-मत्सर' हैं। काम से क्रोध उत्पन्न होता है और इस प्रकार ये इकट्ठे चलते हैं । लोभ से मोह व वैचित्य [ज्ञान का नाश] होता है और ये दोनों मिलकर रहते हैं । मद व अभिमान के आने पर ही मात्सर्य [= ईर्ष्या] होने लगती है, यह इनका द्वन्द्व है । ये खूब फुंकार मारते हुए, बड़ी प्रबलता से हमारे पर आक्रमण करते हैं । उस समय प्रभु ही इनका नाश करनेवाले होते हैं । यही प्रभु - मित्रता का लाभ है। प्रभु कहते हैं कि (अहम्) = मैं (एतान्) = इन (शाश्वसतः) = आक्रमण के समय प्रबल श्वास लेते हुए अथवा अत्यन्त प्रबल द्वा द्वा-दो-दो में चलानेवाले काम-क्रोध आदि को (अवाहनम्) = सुदूर विनष्ट कर देता हूँ । वस्तुतः हम इन कामादि को पराजित नहीं कर पाते, प्रभु ही इनका संहार करते हैं। कामदेव वेदज्ञान से ही भस्म किया जाता है। [२] ये शत्रु वे हैं (ये) = जो (वज्रम्) = [वज गतौ ] गतिशीलता रूप वज्र को हाथ में लिये हुए (इन्द्रम्) = इन्द्र [आत्मा] को भी (युधये अकृण्वत्) = युद्ध के लिये करते हैं । उसके साथ भी युद्ध करना चाहते हैं । (आह्वयमानान्) = ये इन्द्र को युद्ध के लिये आह्वान देते लगते हैं। दृढा=ये अत्यन्त प्रबल हैं । [३] परन्तु कितने भी ये प्रबल हों, जीव के लिये ही इनकी प्रबलता है, परमात्मा के सामने इनकी क्या शक्ति ? प्रभु कहते हैं कि (अनमस्युः) = इनके सामने न झुकनेवाला मैं (नमस्विनः) = मेरे तेज के सामने नतमस्तक इन कामादि को (हन्मना) = हनन के साधनभूत वज्र से नष्ट कर देता हूँ। कैसा मैं? (वदन्) = जीवात्मा के लिये ज्ञान का उपदेश देता हुआ । वस्तुतः प्रभु इन शत्रुओं का संहार इसी प्रकार करते हैं कि हृदय के अन्दर स्थित हुए हुए प्रभु जीव को ज्ञान देते हैं, इस ज्ञानाग्नि में सब शत्रु भस्म हो जाते हैं । प्रभु स्मरण सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला है ।
Connotation: - भावार्थ - कामादि शत्रु प्रबल हैं। पर प्रभु स्मरण के सामने ये निर्बल हो जाते हैं। प्रभु अपने भक्त को ज्ञान देकर उस ज्ञानाग्नि में इन शत्रुओं का दहन कर देते हैं ।