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अ॒हमे॒ताञ्छाश्व॑सतो॒ द्वाद्वेन्द्रं॒ ये वज्रं॑ यु॒धयेऽकृ॑ण्वत । आ॒ह्वय॑मानाँ॒ अव॒ हन्म॑नाहनं दृ॒ळ्हा वद॒न्नन॑मस्युर्नम॒स्विन॑: ॥

English Transliteration

aham etāñ chāśvasato dvā-dvendraṁ ye vajraṁ yudhaye kṛṇvata | āhvayamānām̐ ava hanmanāhanaṁ dṛḻhā vadann anamasyur namasvinaḥ ||

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Pad Path

अ॒हम् । ए॒तान् । शाश्व॑सतः । द्वाऽद्वा॑ । इन्द्र॑म् । ये । वज्र॑म् । यु॒धये॑ । अकृ॑ण्वत । आ॒ऽह्वय॑मानान् । अव॑ । हन्म॑ना । अ॒ह॒न॒म् । दृ॒ळ्हा । वद॑न् । अन॑मस्युः । न॒म॒स्विनः॑ ॥ १०.४८.६

Rigveda » Mandal:10» Sukta:48» Mantra:6 | Ashtak:8» Adhyay:1» Varga:6» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:6


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (एतान्-शाश्वसतः) इन बार-बार या भली-भाँति प्राण लेते हुओं को (ये-इन्द्रं द्वा द्वा वज्रं युधये अकृण्वत) जो मुझ ऐश्वर्यवान् के प्रति शुष्क-आर्द्र दो-दो धाराओंवाले वज्र को युद्ध के लिए सम्पन्न करते हैं-फेंकते हैं (आह्वयमानान्) उन आह्वान करनेवाले विरोधियों (नमस्विनः) वज्रवालों को (अनमस्युः) वज्र को अपेक्षित न करते हुए भी (दृढा वदन्) दृढ़ वचनों को घोषित करता हुआ (हन्मना-अहम्-अव-अहनम्) मैं हनन बल रखनेवाला नष्ट करता हूँ ॥६॥
Connotation: - वज्रधारी नास्तिक प्राणीजनों को वज्र की अपेक्षा न रखता भी हननशक्ति से सम्पन्न परमात्मा नष्ट कर देता है ॥६॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

कामादि शत्रुओं का हनन

Word-Meaning: - [१] हमारे जीवन के महान् शत्रु 'काम-क्रोध, लोभ-मोह व मद-मत्सर' हैं। काम से क्रोध उत्पन्न होता है और इस प्रकार ये इकट्ठे चलते हैं । लोभ से मोह व वैचित्य [ज्ञान का नाश] होता है और ये दोनों मिलकर रहते हैं । मद व अभिमान के आने पर ही मात्सर्य [= ईर्ष्या] होने लगती है, यह इनका द्वन्द्व है । ये खूब फुंकार मारते हुए, बड़ी प्रबलता से हमारे पर आक्रमण करते हैं । उस समय प्रभु ही इनका नाश करनेवाले होते हैं । यही प्रभु - मित्रता का लाभ है। प्रभु कहते हैं कि (अहम्) = मैं (एतान्) = इन (शाश्वसतः) = आक्रमण के समय प्रबल श्वास लेते हुए अथवा अत्यन्त प्रबल द्वा द्वा-दो-दो में चलानेवाले काम-क्रोध आदि को (अवाहनम्) = सुदूर विनष्ट कर देता हूँ । वस्तुतः हम इन कामादि को पराजित नहीं कर पाते, प्रभु ही इनका संहार करते हैं। कामदेव वेदज्ञान से ही भस्म किया जाता है। [२] ये शत्रु वे हैं (ये) = जो (वज्रम्) = [वज गतौ ] गतिशीलता रूप वज्र को हाथ में लिये हुए (इन्द्रम्) = इन्द्र [आत्मा] को भी (युधये अकृण्वत्) = युद्ध के लिये करते हैं । उसके साथ भी युद्ध करना चाहते हैं । (आह्वयमानान्) = ये इन्द्र को युद्ध के लिये आह्वान देते लगते हैं। दृढा=ये अत्यन्त प्रबल हैं । [३] परन्तु कितने भी ये प्रबल हों, जीव के लिये ही इनकी प्रबलता है, परमात्मा के सामने इनकी क्या शक्ति ? प्रभु कहते हैं कि (अनमस्युः) = इनके सामने न झुकनेवाला मैं (नमस्विनः) = मेरे तेज के सामने नतमस्तक इन कामादि को (हन्मना) = हनन के साधनभूत वज्र से नष्ट कर देता हूँ। कैसा मैं? (वदन्) = जीवात्मा के लिये ज्ञान का उपदेश देता हुआ । वस्तुतः प्रभु इन शत्रुओं का संहार इसी प्रकार करते हैं कि हृदय के अन्दर स्थित हुए हुए प्रभु जीव को ज्ञान देते हैं, इस ज्ञानाग्नि में सब शत्रु भस्म हो जाते हैं । प्रभु स्मरण सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला है ।
Connotation: - भावार्थ - कामादि शत्रु प्रबल हैं। पर प्रभु स्मरण के सामने ये निर्बल हो जाते हैं। प्रभु अपने भक्त को ज्ञान देकर उस ज्ञानाग्नि में इन शत्रुओं का दहन कर देते हैं ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (एतान्-शाश्वसतः) इमान् पुनः पुनर्भृशं वा प्राणतः प्राणं गृह्णतः (ये-इन्द्रं द्वा द्वा वज्रं युधये-अकृण्वत) ये मामिन्द्रं प्रति द्वौ द्वौ मिलित्वा यच्छुष्कार्द्रभावको वज्रो भवति तं युद्धाय कुर्वन्ति सम्पादयन्ति क्षिपन्ति (आह्वयमानान्) तानाह्वयतो विरोधिनः (नमस्विनः) वज्रवतः “नम वज्रनाम” [निघ० २।२०] (अनमस्युः) वज्रमनिच्छुरपि (दृढा वदन्) दृढानि वचनानि वदन् घोषयन् (हन्मना अहम्-अव-अहनम्) हननबलेनाहं हन्मि ॥६॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - I destroy those challengers who, panting for battle in two’s, raise their thunder weapon and challenge the mighty ruling power of the system. I throw them off without the weapon, without bending in compromise either, but with a determined mind and the warning word of the inevitable.