Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यत्) = जो (त्वा यामि) = [याचामि ] आप से हम प्रार्थना करते हैं (न:) = हमें (तत्) = वह (दद्धि) = दीजिये । हम चाहते हैं कि आप हमें (बृहन्तं क्षयम्) = एक विशाल निवास-स्थान दें, (जनानां असमम्) = ऐसा विशाल जिसके कि समान औरों का है ही नहीं, यहाँ भौतिक दृष्टिकोण से घर की विशालता का संकेत तो लगता ही है, पर वैदिक साहित्य में इस बाह्य दृष्टि से विशाल घर का इतना महत्त्व नहीं है जितना कि घर में रहनेवाले व्यक्तियों के हृदयों की विशालता का । छठे मन्त्र में 'बृहस्पतिम्' शब्द द्वारा उसका आभास दिया जा चुका है। जिस घर में उदार हृदय पुरुषों का वास है वह घर विशाल ही है । [२] इस प्रकार यह घर उदार हृदयवाले व्यक्तियों से युक्त हो कि (तद्) = उसे (द्यावापृथिवी) = द्युलोक से पृथिवीलोक तक सभी व्यक्ति (अभिगृणीताम्) = स्तुत करें, सभी उस घर की प्रशंसा करें। [३] इस प्रकार विशाल हृदयता को अपनानेवाले (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (रयिं दाः) = उस पुत्राख्य धन को दीजिये जो कि (चित्रम्) = खूब ही ज्ञानी बनकर ज्ञान का देनेवाला बने तथा (वृषणम्) = शक्तिशाली हो ।
Connotation: - भावार्थ- हमारे घर विशाल हृदयवाले पुरुषों से युक्त हों जिससे हमारे सन्तान भी उत्तम हों । सूक्त का प्रारम्भ इस प्रकार हुआ है कि वे प्रभु वसुपति व गोपति हैं, [१] वे हमें क्रियाशील- प्रभु-पूजक सन्तान दें, [२] वह सन्तान जो कि निरभिमान हो, [३] शक्तिशाली व ज्ञानी हो, [४] उत्तम शरीर व इन्द्रियोंवाला हो, [५] सुमेध व विनीत हो, [६] ऐसे सन्तानों की प्राप्ति के लिये हम प्रभु का स्तवन करनेवाले बनें, [७] और विशाल हृदय हों, [८] ऐसा होने पर लोग बुद्धि के दृष्टिकोण से 'वैकुण्ठ' कुण्ठात्व शून्य बुद्धिवाले होंगे [विगता कुण्ठा यस्य] तीव्र बुद्धि होने के साथ वे इन्द्र-शक्तिशाली होंगे। यह 'वैकुण्ठ इन्द्र' ही अग्रिम सूक्त का ऋषि है तथा सर्वमहान् 'वैकुण्ठ इन्द्र" प्रभु ही सूक्त के देवता हैं-