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नि प॒स्त्या॑सु त्रि॒तः स्त॑भू॒यन्परि॑वीतो॒ योनौ॑ सीदद॒न्तः । अत॑: सं॒गृभ्या॑ वि॒शां दमू॑ना॒ विध॑र्मणाय॒न्त्रैरी॑यते॒ नॄन् ॥

English Transliteration

ni pastyāsu tritaḥ stabhūyan parivīto yonau sīdad antaḥ | ataḥ saṁgṛbhyā viśāṁ damūnā vidharmaṇāyantrair īyate nṝn ||

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Pad Path

नि । प॒स्त्या॑सु । त्रि॒तः । स्त॒भु॒ऽयन् । परि॑ऽवीतः । योनौ॑ । सी॒द॒त् । अ॒न्तरिति॑ । अतः॑ । स॒म्ऽगृभ्य॑ । वि॒शाम् । दमू॑ना । विऽध॑र्मणा । अ॒य॒न्त्रैः । ई॒य॒ते॒ । नॄन् ॥ १०.४६.६

Rigveda » Mandal:10» Sukta:46» Mantra:6 | Ashtak:8» Adhyay:1» Varga:2» Mantra:1 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:6


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (पस्त्यासु) मनुष्यप्रजाओं के अन्दर (त्रितः) शरीर-आत्मा-मन सम्बन्धी तीनों सुखों का विस्तार करनेवाला परमात्मा (परिवीतः) परिप्राप्त-व्याप्त (स्तभुयन्) उन मनुष्यादि प्रजाओं को स्थिर करता हुआ-नियत करता हुआ (योनौ-अन्तः-निसीदत्) हृदयों के अन्दर विराजमान है (अतः) इससे (विशां सङ्गृभ्य दमूनाः) मनुष्यप्रजाओं के कर्मों को लेकर उनके कर्मफल देने के मनवाला होकर (विधर्मणा) अपने न्यायकर्म से (नॄन्-अयन्त्रैः-ईयते) मुमुक्षुओं को किन्हीं गमनसाधनों के बिना प्राप्त होता है-साक्षात् होता है ॥६॥
Connotation: - मनुष्यों के शारीरिक मानसिक तथा आत्मिक सुखों का विस्तार करनेवाला परमात्मा है। वह उनके कर्मानुसार फल देता है। मुमुक्षु उपासकों के हृदय में स्वतः साक्षात् होता है। उसे किसी यानादि साधन की आवश्यकता नहीं है ॥६॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

त्रित व त्रिदण्डी

Word-Meaning: - [१] (त्रितः) = 'त्रीन् तरति वा त्रीन् तनोति' काम-क्रोध-लोभ को जो तैर जाता है अथवा ज्ञान, कर्म व उपासना का जो विस्तार करता है अथवा शरीर, मन व बुद्धि का जो विकास करता है, (स्तभूयन्) = जो उत्पन्न सोमरूप शक्ति को शरीर में ही रोकने के लिये इच्छा करता है, (योनौ) = सब के मूल उत्पत्ति - स्थान प्रभु में (परिवीतः) = चारों ओर से व्याप्त हुआ है, प्रभु के गोद में ही मानो बैठा हुआ है, यह त्रित पस्त्यासु अन्तः प्रजाओं के अन्दर नि सीदत् निषपक्ष होता है। प्रजाओं के हित के लिये उन्हीं में विचरण करनेवाला होता है । [२] (अतः) = इस प्रभु से (संगृभ्या) = ज्ञान को ग्रहण करके, यह (दमूना) = दान्त मनवाला अथवा दान के मनवाला (त्रित विशाम्) = प्रजाओं के (विधर्मणा) = विशेषरूप से धारण के हेतु से (यन्त्रैः) = नियमनों के साथ, शरीर, वाणी व मन के दमन के साथ, अर्थात् इन तीनों का नियमन करता हुआ (नॄन्) = मनुष्यों को (ईयते) = प्राप्त होता है । उसका नियमित जीवन लोगों के लिये उत्तम उदाहरण को उपस्थित करता है । [३] यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि जिसने लोकहित के कार्यों में प्रवृत्त होना ही उसे [क] 'त्रित' होना चाहिए, काम-क्रोध-लोभ से ऊपर तथा ज्ञान-कर्म-उपासना तीनों को अपनानेवाला, [ख] यह स्तभूयन् हो, शक्ति का शरीर में ही स्तम्भन करे । अशक्त शक्ति ने क्या लोकहित करना, [ग] (योनौ परिवीत:) = यह प्रभु के आश्रय से रहनेवाला हो । यह प्रभु का सान्निध्य उसे निर्भीक बनाता है। [घ] (दमूना:) = यह दान्त मनवाला व दान की वृत्तिवाला हो । लोभ लोकहित का विरोधी है। [ङ] (यन्त्रैः) = यह शरीर, वाणी व मन तीनों का नियमन करे, त्रिदण्डी हो ।
Connotation: - भावार्थ - हम हित बनकर लोकहित के कार्यों में व्यापृत हों ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (पस्त्यासु) विक्षु मनुष्यादिप्रजासु “विशो वै पस्त्याः” [श० ५।३।५।११] (त्रितः) सुखत्रयस्य विस्तारकः परमात्मा, “यस्त्रीणि शरीरात्ममनस्सम्बन्धीनि सुखानि तनोति सः” [ऋ० २।३४।१४ दयानन्दः] (परिवीतः) परिप्राप्तः (स्तभुयन्) ता विशः प्रजाः स्थिरीकुर्वन् (योनौ-अन्तः-निसीदत्) हृदयेऽन्तर्निषीदति (अतः) अत एव (विशां सङ्गृभ्य दमूनाः) मनुष्यप्रजानां कर्माणि सङ्गृह्य तत्कर्मफलाय दानमनाः सन् (विधर्मणा) स्वकीयन्यायकर्मणा “विधर्मधर्मस्य विधृत्यै” [ताण्ड्य० १५।५।३१] (नॄन्-अयन्त्रैः-ईहते) मुमुक्षून् “नरो ह वै देवविशः” [जै० १।८९] कैश्चिद् गमनसाधनैर्विना प्राप्नोति साक्षाद् भवति ॥६॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, the light of three worlds, all supportive and sustaining, enveloped in light and flames, sits in the vedi in the homes as in the midst of regions of the universe, and from there, having received the homage of yajnic oblations, the generous Agni reaches the leading divinities of nature and humanity in various ways according to different laws of nature.