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अक्र॑न्दद॒ग्निः स्त॒नय॑न्निव॒ द्यौः क्षामा॒ रेरि॑हद्वी॒रुध॑: सम॒ञ्जन् । स॒द्यो ज॑ज्ञा॒नो वि हीमि॒द्धो अख्य॒दा रोद॑सी भा॒नुना॑ भात्य॒न्तः ॥

English Transliteration

akrandad agniḥ stanayann iva dyauḥ kṣāmā rerihad vīrudhaḥ samañjan | sadyo jajñāno vi hīm iddho akhyad ā rodasī bhānunā bhāty antaḥ ||

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Pad Path

अक्र॑न्दत् । अ॒ग्निः । स्त॒नय॑न्ऽइव । द्यौः । क्षाम॑ । रेरि॑हत् । वी॒रुधः॑ । स॒म्ऽअ॒ञ्जन् । स॒द्यः । ज॒ज्ञा॒नः । वि । हि । ई॒म् । इ॒द्धः । अख्य॑त् । आ । रोद॑सी॒ इति॑ । भा॒नुना॑ । भा॒ति॒ । अ॒न्तरिति॑ ॥ १०.४५.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:45» Mantra:4 | Ashtak:7» Adhyay:8» Varga:28» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:4» Mantra:4


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (द्यौः) द्युलोक में दीप्त विद्युदग्नि (स्तनयन्-इव यथा) शब्द करता हुआ चमकता है, तथा (अग्निः) यह पार्थिव अग्नि (क्षाम) पृथिवी के प्रति (अक्रन्दत्) जलता हुआ शब्द करता है (वीरुधः-समञ्जन् रेरिहत्) ओषधियों को काष्ठों को संसक्त हुआ-जलता हुआ भस्मी करने के लिए बार-बार चाटता है-स्पर्श करता है (सद्यः-जज्ञानः) तुरन्त प्रकट हुआ (हि-ईम्-इद्धः) इस प्रकार प्रज्वलित हुआ (अख्यत्) प्रत्यक्ष होता है (रोदसी-अन्तः-भानुना वि भाति) द्युलोक पृथिवीलोक के मध्य में दीप्ति से विशिष्टरूप से प्रकाशित होता है ॥४॥
Connotation: - द्युलोक में सूर्यरूप से अग्नि प्रकाशमान होता है, अन्तरिक्ष में विद्युद्रूप से और पृथ्वी पर काष्ठ इन्धन द्वारा पार्थिव अग्नि के रूप में प्रकाशित होता है, इस प्रकार अग्नितत्त्व द्यावापृथ्वीमय जगत् में प्रसिद्ध हुआ अन्य प्रदार्थों का प्रकाशक है ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रकाशमय जीवन

Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार जब हम त्रिलोकी की इन अग्नियों को अपने में प्रज्ज्वलित करते हैं तो वे महान् (अग्निः) = अग्रेणी प्रभु (अक्रन्दत्) = हमारे हृदयों में हमारे कर्मों की प्रतिपादिका वाणियों का उच्चारण करते हैं। हमारे कर्त्तव्य का ज्ञान देते हैं, स्वं प्रभु (स्तनयन् इव द्यौ:) = गर्जना हुए द्युलोक के समान होते हैं। वे प्रभु (क्षामा) = हमारे इस पृथिवीरूप शरीर को (रेरिहत्) = आस्वादयुक्त बना देते हैं। प्रभु कृपा से 'भूयासं मधु सन्दृशः' इस मन्त्र भाग को हम अपने जीवन में घटा हुआ देखते हैं। हमारे इस शरीर के द्वारा होनेवाली सब क्रियाएँ माधुर्य को लिये हुए होती हैं । [२] वे प्रभु (वीरुधः) = [वि- रुह] विशिष्ट रोहणों, उत्त्थानों व उन्नतियों को (समञ्जन्) = हमारे जीवन में व्यक्त करते हैं । (सद्यः) = शीघ्र ही (जज्ञान:) = प्रादुर्भूत होते हुए वे प्रभु (हि) = निश्चय से (इद्ध:) = दीप्त हुए- हुए (वि अख्यद्) = हमारे जीवनों को प्रकाशमय बनाते हैं। (अन्तः) = अन्तःस्थित हुए हुए वे प्रभु (रोदसी) = द्यावापृथिवी को, मस्तिष्क व शरीर को (भानुना) = दीप्ति से (आभाति) = समन्तात् प्रकाशित करते हैं। हमारा मस्तिष्क ज्ञान ज्योति से चमकने लगता है, तो यह शरीर स्वास्थ्य के तेज से दीप्त करते हो जाता है ।
Connotation: - भावार्थ – अग्निरूप प्रभु की प्रेरणा को सुनने पर हमारा जीवन प्रकाशमय हो जाता है ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (द्यौः) द्युलोकं प्रति दीप्तो विद्युदग्निः (स्तनयन् इव यथा) शब्दयन् प्रकाशते, तथा (अग्निः) एषः पार्थिवोऽग्निः (क्षाम) पृथिवीं प्रति “क्षाम क्षामा पृथिवीनाम” [निघ० १।१] (अक्रन्दत्) क्रन्दति ज्वलन् सन् शब्दं करोति (वीरुधः-समञ्जन् रेरिहत्) ओषधीः काष्ठानि संसक्तः सन् प्रज्वलयन् पुनः पुनः लेढि भस्मीकरणाय (सद्यः-जज्ञानः) प्रकटीभूतस्तत्काले तदैव (हि-ईम्-इद्धः) एवं खलु दीप्तः प्रज्वलितः (अख्यन्) प्रत्यक्षं भवति (रोदसी-अन्तः भानुना विभाति) द्यावापृथिव्योरन्तर्मध्ये “रोदसी द्यावापृथिवीनाम” [निघ० ३।३०] द्युलोकपृथिवीलोकयोर्मध्ये विशिष्टं प्रकाशते ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni roars as if thundering and shaking the skies, at the same time reaching and kissing the earth and beautifying the greenery. Always present, instantly rising, it proclaims itself, shines, and fills the heaven and earth with its light.