मूढ़ों की अमूढ़ से प्रार्थना
Word-Meaning: - हे (अमूर) = अमूढ़, माया के अधिपति होने से इस माया से मूढ़ न बनाये जानेवाले प्रभो ! (चिकित्व) = हे ज्ञान सम्पन्न प्रभो ! (मूराः वयम्) = मूर्ख हम लोग, इस माया से मूढमति बने हुए हम (महित्वम्) = आपकी महिमा को (न) = नहीं जान पाते हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो! अंग - हे सर्व प्रभो ! (त्वम्) = आप ही अपनी रस महिमा को (वित्से) = जानते हो। आपकी महिमा हमारे लिए अचिन्त्य है, आपकी महिमा का पार पाना किसी भी व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं । यह अचिन्यमहिम प्रभु (वव्रिः) = अत्यन्त सुन्दर रूप वाले होते हुए [वत्रिः रूपनाम नि ३.७] (शये) = हमारे अन्तःकरणों में ही निवास करते हैं। (जिह्वया) = जिह्वा से अर्थात् हृदयस्थ रूपेण उच्चारित वेदवाणी से (अदन्) = हमारे सब मलों को अदन्- खाते जाते हुए अर्थात् समाप्त करते हुए ये प्रभु हमारे जीवनों को उसी प्रकार निर्मल बना देते हैं जैसे कि कोई गौ जिह्वा से बछड़े के शरीर को चाटकर ठीक कर देती है । ये प्रभु (विश्पतिः) = सब प्रजाओं के रक्षक (सन्) = होते हुए (युवतिम्) = अपने से मिश्रण व सम्पर्क करनेवाली प्रजा को अथवा दुर्गुणों से अपना अमिश्रण व गुणों से मिश्र करनेवाले व्यक्ति को (रेरिह्यते) = खूब मधुर जीवनवाला, स्वादमय जीवनवाला बना देते हैं । जो भी व्यक्ति प्रभु के सम्पर्क में आता है, उसका जीवन मधुर बन जाता है। वह सब प्रजाओं का पति उस परमात्मा को जानता हुआ सब में समदृष्टि होकर प्रेम वाला होता है। इस एकत्व दर्शन वाले को शोक मोह नहीं सताते ।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु की महिमा प्रभु ही जानते हैं। अचिन्य होते हुए भी वे अपने सुन्दरतम रूप से वे प्रभु हमारे हृदयों में ही हैं। ज्ञानवाणियों से वे हमारे जीवनों को पवित्र कर देते हैं। अपने सम्पर्क में आनेवाले के जीवन को वे मधुर बना देते हैं ।