Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार सोम का भरण व रक्षण करनेवाले (वयम्) = हम (जीवाः) = उत्तम जीवनवाले (जीवपुत्रा) = दीर्घजीवी सन्तानोंवाले (अनागसः) = निष्पाप होते हुए (सनित्वभिः) = संभजन की वृत्तिवाले पुत्र-पौत्रादिकों के साथ (तत्) = उस दिव्यगुणों के समूह को (सुसनिता) = उत्तम संभजन से सनेम उपासित करें। वस्तुतः संविभागपूर्वक धन का सेवन ही प्रभु का उपासन है, यही दिव्यगुणों की प्राप्ति का मार्ग है। 'हविषाविधेम' हवि के द्वारा, दानपूर्वक अदन के द्वारा हम प्रभु का पूजन करें यह मन्त्र भाग कई बार पढ़ा गया है। 'यज्ञ' की मौलिक भावना भी यही है 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा:'- देव यज्ञ के द्वारा ही उस यज्ञ [ = पूज्य] की उपासना करते हैं । [२] (ब्रह्मद्विषः) = ज्ञान से प्रीति न करनेवाले लोग ही (विश्वग्) = विविध गतियोंवाले (एनः) = इस पाप को (भरेरत) = धारण करें। अज्ञानियों में ही पाप का वास हो। हम तो संविभागपूर्वक यज्ञियवृत्ति से वस्तुओं का उपभोग करते हुए ज्ञानी बनें और पाप को अपने से दूर ही रखें। [३] इस प्रकार (तद्) = उस (देवानां अवः) = देवताओं के रक्षण को (अद्या) = आज (वृणीमहे) = हम वरते हैं। अपने अन्दर दिव्यता को धारण करते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- हम संविभाग की वृत्ति से प्रभु का उपासन करनेवाले बनें, ज्ञानी बनकर निष्पाप जीवनवाले हों।