Word-Meaning: - [१] हे (देवासः) = देवो ! (यम्) = जिसको आप (वाजसातौ) = इस जीवन में (अवथ) = रक्षित करते हो, (यं त्रायध्वे) = जिसको आप रोगादि के आक्रमण से बचाते हो और (यम्) = जिसे (अंहः अतिपिपृथ) = पाप से पार ले जाते हो इस प्रकार (यः) = जो (वः) = आपके (गोपीथे) = रक्षण में होता है वह (भयस्य न वेद) = किसी भय को प्राप्त नहीं होता देवों के रक्षण में स्थित होने पर एक मनुष्य को निर्धनता जनित कष्ट परेशान नहीं करते, वह रोगों का शिकार नहीं होता और वह पापगर्त में नहीं फँसता। [२] हे देवो! आप ऐसी कृपा करो कि हम भी (ते स्याम) = वे ही हों जो आपके रक्षण में निर्भीक होकर विचरते हैं तथा (तुरासः) = त्वरावाले, शीघ्रता से कार्य करनेवाले अथवा शत्रुओं का संहार करनेवाले हम (देववीतये) = दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए (स्याम) हों । देवों के रक्षण में हम अपने अन्दर उत्तरोत्तर दिव्यगुणों का वर्धन कर पायें ।
Connotation: - भावार्थ-जीवन-संग्राम में देव हमारा रक्षण करें। हमें वे रोगों से बचाएँ तथा पापों के पार ले जायें। इस प्रकार हम अपने में दिव्यगुणों का वर्धन करनेवाले बनें । सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से हुआ है कि स्वाध्याय के द्वारा हम अपने में ज्योति का भरण करें। [१] रेतःकणों के रक्षण से हम निष्पापता को प्राप्त करें, [२] उषा हमारे पापों को दग्ध करे, [३] हम धनी हों, पर कभी क्रोधाभिभूत न हों, [४] उषा से प्रेरित होकर हम ज्योति का भरण करें, [५] उषाएँ हमारे लिये नीरोगता को लानेवाली हों, [६] हमारे जीवन में धन व ज्ञान का समन्वय हो पाये, [७] ऋत का हम पालन करें, [८] आचार्यों के सम्पर्क में रहकर ज्ञान को बढ़ायें, [९] 'इन्द्र, मित्र, वरुण व भग' के उपासक बनें, [१०] बृहस्पति पूषा अश्विनौ भग का निरन्तर पूजन हो, [११] सुप्रवाचन, सुभर व नृपाय्य घर हमें प्राप्त हो, [१२] इस घर में हम 'प्राणायाम व अग्निहोत्र' को नियम से अपनायें, [१३] देव कृपा से हमें अभय प्राप्त हो, [१४] हम देवों का आराधन करनेवाले हों।