दिव्य-प्रकाश [Divine light]
Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! तू (दिव्यानि रोचना) = दिव्य दीप्तियों को [Divine light] (वियासि) = विशेषरूपेण प्राप्त होता है। जितेन्द्रियता ही वस्तुतः दिव्य प्रकाश की प्राप्ति का साधन होती है । [२] हे इन्द्र ! तू (पार्थिवानि [ रोचना] वियासि) = पार्थिव दीप्तियों को भी विशेषरूप से प्राप्त होता है । स्वास्थ्य के कारण शरीर पर प्रकट होनेवाला सौन्दर्य ही 'पार्थिव रोचन' है । इसमें कमी आने पर चेहरा मुरझाया-सा प्रतीत होता है। [३] हे इन्द्र ! तू (रजसा) = [ रजः कर्मणि] कर्म के द्वारा अथवा 'रजः अन्तरिक्षम्' अपने हृदयान्तरिक्ष के द्वारा (पुरुष्टुत) = बहुतों से स्तुत होता है । कर्मों के कारण व हृदयान्तरिक्ष की निर्मलता के कारण तेरी सब प्रशंसा करते हैं । [४] हे प्रभो (ये) = जो भी व्यक्ति (त्वा वहन्ति) = आपका धारण करते हैं और (मुहुः) = फिर (अध्वरान् उप) = हिंसारहित यज्ञात्मक कर्मों के समीप निवास करते हैं, अर्थात् जो आपका स्मरण करते हैं और यज्ञों में लगे रहते हैं (ते) = वे (वग्वनान्) = केवल वाणी का सेवन करनेवाले [वच् वन], बात करनेवाले, परन्तु (अराधसः) = कार्यों को न सिद्ध करनेवाले पुरुषों को सुवन्वन्तु उत्तमता से जीतनेवाले हों [वन् win]। 'बातें करना और कामों को न करना' यह अवनति का मार्ग है और इसके विपरीत 'प्रभु का हृदय में स्मरण करना और यज्ञों में लगे रहना' ही उन्नति का मार्ग है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु - स्मरणपूर्वक हम कर्मों में लगे रहें, इसी से हमें दिव्य प्रकाश प्राप्त होगा, स्वास्थ्य की दीप्ति मिलेगी और कर्मों की भावना व हृदय की पवित्रता से प्रशस्त जीवनवाले होंगे।