Word-Meaning: - [१] (यद् ह) = जब निश्चय से (क्षुमन्तः) = भूखवाले, अर्थात् जिनकी जाठराग्नि बुझ नहीं गई और जाठराग्नि के ठीक होने के कारण ही (शवसा) = बल व शक्ति के साथ (समायन्) = गतिवाले होते हैं, तब (इयं सा क्षा) = यह वह प्रसिद्ध पृथिवी (उषसां इव) = उषःकालों की तरह (भूयाः) = हो, अर्थात् जिस प्रकार उषः काल के द्वारा अन्धकार का नाश होकर उत्तरोत्तर प्रकाश की वृद्धि होती चलती है, उसी प्रकार हमारे जीवनों में उत्तरोत्तर ज्ञान का प्रकाश बढ़ता चले। इस प्रकार के जीवन को बनाने के लिये यह आवश्यक ही है कि हमारा शरीर का स्वास्थ्य ठीक हो, हम शक्ति सम्पन्न हों और गतिशील क्रियामय जीवनवाले हों। [२] (अस्य) = इस क्रियात्मक जीवन से (जरितुः) = स्तुति करनेवाले की (स्तुतिं भिक्षमाणाः) = स्तुति की प्रार्थना करते हुए, अर्थात् इस प्रकार की स्तुति को सदा कर सकने की कामनावाले (शग्मासः) = अत्यन्त सुख को करनेवाले, 'peace, plenty and power ' वाले (वाजाः) = बल व ज्ञान (नः) = हमें (उपयन्तु) = समीपता से प्राप्त हों, अर्थात् हम शान्तिकर सुखों से युक्त बलों को प्राप्त करें, परन्तु वे बल हमें प्रभु की क्रियात्मक स्तुति से सम्पन्न करनेवाले हों ।
Connotation: - भावार्थ- हमारी जाठराग्नि ठीक हो, शक्ति से युक्त होकर हम क्रियामय जीवनवाले हों । हमारे जीवन में उत्तरोत्तर प्रकाश की अभिवृद्धि हो। हमें सुखकर शक्तियों की प्राप्ति हो और हम प्रभु-स्तवन से कभी दूर न हों ।