Word-Meaning: - [१] (उत) = और (कण्वम्) = कण-कण करके उत्तमता का संचय करनेवाले को, अतएव मेधावी को (नृषदः) = सब मनुष्यों में निवास करनेवाले प्रभु का (पुत्रम्) = पुत्र (आहुः) = कहते हैं । प्रभु 'नृषद्' हैं, यह मधुरवाणी बोलनेवाला, आत्मरक्षण करनेवाला व्यक्ति प्रभु का सच्चा पुत्र है । [२] (उत) = और (श्यावः) = [श्यैङ्गतौ ] खूब क्रियामय जीवनवाला यह (वाजी) = शक्तिशाली बनता है और (धनम्) = धन को (आदत्त) = प्राप्त करता है । क्रियाशीलता धन प्राप्ति का साधन होती है और शरीर के अंगों को सबल बनाये रखती है। [३] (ऊधः) = ऊधस्, अर्थात् ऊधः स्थानीय दूध (कृष्णाय) = मन को विषयों से वापिस खैंच [आकृष्ट] करके, संसार के रंग में न रंगे जानेवाले के लिये (रुशत्) = देदीप्यमान रूप को (प्र अपिन्वत) = प्रकर्षेण सिक्त करता है। दूध का प्रयोग तथा विषयों में अनासक्ति मनुष्य को दीप्त रूप प्राप्त कराता है। [४] (अत्र) = इस जीवन में (ऋतम्) = ऋत, सत्य व यज्ञ (अस्मै) = इस व्यक्ति के लिये (नकिः अपीपेत्) = क्या वर्धन नहीं करता ? ऋत के द्वारा इसके जीवन में सब आवश्यक वस्तुओं का आप्यायन होता है ।
Connotation: - भावार्थ - मेधावी पुरुष प्रभु का सच्चा पुत्र होता है। गतिशीलता से यह धन व शक्ति का संग्रह करता है। दूध का प्रयोग इसे दीप्तरूप देता है । सत्य व यज्ञ इसे सब आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त कराते हैं। सूक्त के प्रारम्भ में प्रार्थना है कि हमें देवों की मैत्री प्राप्त हो। [१] यज्ञार्थ हम धनों का संग्रह करें, [२] हमारे जीवनों में ध्यान व स्वास्थ्य हो, [३] हम आत्मशासन करनेवाले हों, [४] हमें शान्तिकर शक्तियों की प्राप्ति हो, [५] सुमति बनी रहे, [६] प्रभु को हम उपास्य व भव- बन्धनों का काटनेवाला जानें, [७] हमारे जीवन पवित्र हों, [८] यह जीवन की पवित्रता 'अत्युष्णता, अतिवृष्टि, अग्रिदाह' आदि आपत्तियों से बचायेगी, [९] मधुर जीवन के होने पर वन्ध्यात्व विनष्ट हो जाएगा, [१०] हम उस अन्तःस्थित प्रभु के सच्चे पुत्र होंगे, [११] अच्छे से अच्छे मार्ग की ओर हम बढ़ें।