Word-Meaning: - [१] प्रभु जीव से कहते हैं - हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! मात्रे ते = अपने जीवन का निर्माण करनेवाले तेरे लिये, (मज्मना) = [मज शुद्धौ] शोधक काव्येन ज्ञान से, (द्यौः पृथिवी) = द्युलोक तथा पृथिवीलोक (नु) = निश्चय से (सुमिते) = बड़ी उत्तमता से बनाये गये हैं और (पूर्वी) = ये तेरा पूरण करनेवाले हैं । द्युलोक से लेकर पृथ्वीलोक तक सारा ब्रह्माण्ड प्रभु की देदीप्यमान ज्योति से पूर्णता को लिये हुए बनाया गया है। यहाँ किसी भी प्रकार की कमी नहीं है 'पूर्णमदः पूर्णमिदं' । कमी उन्हीं को लगती है जो जीवन के निर्माण की रुचिवाले न होकर भोगमार्ग में बह जाते हैं । भोगवृत्तिवाले के लिये संसार में कमी ही कमी है, पर निर्माणरूपि व्रती पुरुष को संसार में कमी नहीं दिखती। [२] हे (स्वाद्मन्) = [सु आ अद्मन्] सदा उत्तम भोजन खानेवाले जीव ! (वराय) = [वृणोति इति] ठीक चुनाव करनेवाले तेरे लिये भोग की उपेक्षा जीवन के निर्माण को पसन्द करनेवाले तेरे लिये, (सुतासः) = भोजन से उत्पन्न सोमकण (घृतवन्तः) = मलों के क्षरणवाले तथा ज्ञान की दीप्ति को बढ़ानेवाले (भवन्तु) = हों। सात्त्विक भोजन से उत्पन्न शीतवीर्य के कण शरीर में ही सुरक्षित रहकर शरीर को रोगक्रान्त नहीं होने देते और साथ ही मस्तिष्क की ज्ञानाग्नि का ईंधन बनकर ये ज्ञानाग्नि को दीप्त करते हैं। [३] ये सोमकण (पीतये) = रक्षण के लिये हों । इनकी रक्षा से हम शरीर व मन के रोगों से ऊपर उठें। (मधूनि) = भवन्तु ये अत्यन्त मधुर हों। ये हमारे स्वभाव व जीवन में माधुर्य को लाने का कारण बनें। सोम रक्षा के अभाव में ही स्वभाव में चिड़चिड़ापन आता है और हम द्वेष, ईर्ष्या व क्रोध के वश हो जाते हैं। सोम के सुरक्षित होने पर द्वेष का स्थान प्रेम ले-लेगा, ईर्ष्या के स्थान को मुदिता ले लेगी और क्रोध करुणा से आक्रान्त होकर नष्ट हो जाएगा ।
Connotation: - भावार्थ - जीवन का निर्माण करनेवाले के लिये यह संसार पूर्ण है, भोगवादी इसमें अपूर्णता को देखता है। सुरक्षित सोम हमें क्षीणमल, दीप्तज्ञान व मधुर स्वभाव बनाता है ।