Word-Meaning: - [१] (गोधाः) = वेदवाणी का धारण करनेवाला प्रभु (तेभ्यः) = उनके लिये (एतत्) = इस (अयथम्) = अयथार्थता को अयथायोग को कर्षत् खेंचकर बाहर कर देता है, दूर कर देता है, (ये) = जो (ब्रह्मणः) = ज्ञान के (अन्नैः) = अन्नों से (प्रतिपीयन्ति) = एक-एक बुराई को हिंसित करनेवाले होते हैं । 'ब्रह्म के अन्न' सात्त्विक अन्न हैं, इनके सेवन से सत्त्वशुद्धि के द्वारा मनुष्य अयोग व अतियोग से बचकर सदैव यथायोग करनेवाला बनता है । [२] ये अयथायोग से बचनेवाले व्यक्ति (सिमः) = [सर्वान्] सब (उक्ष्णः) = शक्तिशाली अथवा वीर्यवर्धक अन्नों का, (अवसृष्टान्) = [अनुज्ञातान् ] उन अन्नों का जिनकी कि वेद में अनुज्ञा दी गई है, (अदन्ति) = भक्षण करते हैं, उन्हीं अन्नों का सेवन करते हैं जो सात्त्विक हैं । [३] इस प्रकार सात्त्विक अन्नों के सेवन से ये (तन्वः) = शरीर के (बलानि) = बलों का (शृणाना:) = [ शृणानाः] परिपाक करते हैं। सात्त्विक अन्न के सेवन से उनकी शरीर की सब शक्तियाँ सुन्दर बनती हैं।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु कृपा से हम वस्तुओं का यथायोग करनेवाले होते हैं। ज्ञानवर्धक अन्नों का सेवन करते हैं, उन्हीं पौष्टिक अन्नों का जिनकी कि वेद में अनुज्ञा दी गई है। इस प्रकार ये अपने शरीर के बलों का ठीक परिपाक करते हैं ।