Word-Meaning: - [१] (गावः) = इन्द्रियरूपी गौवें (प्रयुताः) = इस शरीररूप रथ में प्रकर्षेण युक्त हुई हुई (यवम्) = विषयरूप यव को (अक्षन्) = [ भक्षयन्ति] खाती हैं, विषयों का ग्रहण करती हैं । इन्द्रियाँ विषयों में जाती हैं, इसीलिए प्रभु ने इनका निर्माण किया है। [२] (ताः) = इन इन्द्रियरूप गौवों को (सहगोपाः) = ग्वाले सहित, मन ही इनका ग्वाला है, मन इनके साथ विविध विषयों में भटकता है, (चरन्ती:) = विषयों में विचरण करती हुई इन इन्द्रियों को (अर्य:) = इनका स्वामी मैं (अपश्यम्) = इन्हें देखता हूँ [दृश्=look after ] इनका रक्षण करता हूँ। [३] मैं इन इन्द्रियों का स्वामी हूँ । इन्द्रियाँ गौवें हैं, तो मन ग्वाला और आत्मा स्वामी । यहाँ स्वामी ग्वाले सहित गौवों का ध्यान करता है। आत्मा मन सहित इन्द्रियों का निरीक्षण करता है, यही आत्मालोचन कहलाता है। ये इन्द्रियाँ (हवा:) = आह्वान के योग्य हैं। जैसे गौवों को दोहन के लिये बुलाया जाता है इसी प्रकार इन इन्द्रियों को ज्ञान प्राप्ति व कर्मसिद्धि के लिये आत्मा आहूत करता है और ये (इत्) = निश्चय से (अर्यः अभितः) = [अर्यम्] स्वामी के चारों ओर (समायन्) = उपस्थित होती हैं । [४] इन इन्द्रियरूप गौवों के समीप आ जाने पर (स्वपतिः) = अपना पूर्ण प्रभुत्व करनेवाला यह आत्मा (आसु) = इन गौवों में (कियत्) = कितने ही, अर्थात् बहुत अधिक ज्ञान व कर्मरूप दुग्ध को (छन्दयाते) = चाहता है । वह इन्हें खूब ही ज्ञान की प्राप्ति में व यज्ञादि की सिद्धि में व्यापृत रखता है ।
Connotation: - भावार्थ- इन्द्रियाँ गौवें हैं, मन ग्वाला व आत्मा स्वामी है। जब आत्मा इन्हें अपने वश में रखता है तो प्रचुर ज्ञान व कर्मरूप दुग्ध को ये देनेवाली होती हैं।