Word-Meaning: - [१] (सा) = गत मन्त्र में वर्णित वीर्य की ऊर्ध्वगति ही (ते जीवातुः) = तेरी जीवनौषध है। (उत) = और (तस्य विद्धि) = उसको तू अच्छी तरह जान, अर्थात् वीर्य की ऊर्ध्वगति के महत्त्व को तू अच्छी तरह समझ ले । [२] (एतादृग्) = ऐसा तू वीर्य-रक्षा के महत्त्व को समझनेवाला तू (अर्ये) = उस संसार के स्वामी प्रभु में (मा स्म) = मत (सं अपगूहः) = अपने को संवृत कर [ गूह संवरणे], अर्थात् प्रभु से अपने को छिपाने की कोशिश मत कर। प्रभु के सदा सामने रह । [३] यह सदा प्रभु के सामने रहनेवाला व्यक्ति (स्वः) = आत्म- प्रकाश को, सुख को (आविः कृणुते) = प्रकट करता है। इसका जीवन प्रकाशमय व सुखमय होता है। यह (बुसं गूहते) = यह रेतस् के रूप में रहनेवाले अप् तत्त्व को अपने में संवृत व सुरक्षित करता है। [४] (अस्य निर्णिजः) = इस अपने जीवन को शुद्ध करनेवाले का (स पादुः) = वह आचरण [पद गतौ-चर गतौ] (न मुच्यते) = कभी इससे छूटता नहीं, यह सदा अपने जीवन में प्रभु का स्मरण करता है और वीर्यरक्षा पर बल देता है ।
Connotation: - भावार्थ- वीर्यरक्षा ही जीवनौषध है, इसके लिये प्रभु का अविस्मरण आवश्यक है। सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से हुआ है कि हम सुन्नन् यजमान बनें। [१] अदेवयु पुरुष परस्पर लड़कर नष्ट हो जाते हैं, [२] भौतिकता के साथ युद्ध जुड़े हुए हैं, [३] ऐश्वर्यों का यज्ञों में विनियोग करनेवालों का प्रभु रक्षण करते हैं, [४] प्रभु की व्यवस्था को कोई रोक नहीं सकता, [५] शराबियों पर प्रभु का वज्रपात होता है, [६] वे सर्वव्यापक प्रभु हमारे शत्रुओं का नाश करनेवाले हैं, [७] इन्द्रियाँ गौवें हैं और मन ग्वाला व आत्मा स्वामी है, [८] इस चित्त को काबू करनेवाला योगी सारे संसार को अपना परिवार समझता है, [९] योगी एकत्व को देखता है तो भोगी प्रभु को भूल जाता है, [१०] हम कभी प्राकृतिक पदार्थों का अतियोग न करें, [११] प्रकृति को हम अपना मित्र बनाएँ न कि पत्नी, [१२] इस बात को न भूलें कि नम्रता से ही उन्नति होती है, [१३] वेदवाणी अपने ज्ञानदुग्ध से हमारे जीवन का सुन्दर पोषण करती है, [१४] हमारा प्रयत्न यह हो कि हम दशम दशक से पूर्व ही काम के वेग को जीत लें, [१५] प्रभु व प्रकृति को अपना पिता व माता जानें, [१६] प्राणसाधना द्वारा शरीर आदि का ठीक परिपाक करें, [१७] प्रभु स्मरण पूर्वक कर्मों में लगे रहें, [१८] प्रभु सद्गृहस्थों को प्राप्त होते हैं, [१९] इस प्रभु की महिमा समुद्र जल, सूर्य व मेघ में होती है, [२०] कर्म ज्ञान व उपासना का समन्वय ही हमें तरायेगा, [२१] प्रत्येक शरीर में वेदवाणी रूप गौ बद्ध है, [२२] उसके द्वारा हम ज्ञान प्राप्ति में सर्वप्रथम हों, [२३] वीर्यरक्षा को ही जीवनौषध समझें, [२४] हमारा यही प्रयत्न हो कि हमारे जीवन में वासनाओं की प्रबलता न होकर प्रभु का आगमन हो ।