Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र की समाप्ति पर कहा था कि 'उत्तान भूमि को प्राप्त करता है'-उन्नत स्थिति को प्राप्त करता है । उस उन्नत स्थिति का चित्रण करते हुए कहते हैं कि - [क] (बृहन्) = [बृहि वृद्धौ ] यह वृद्धि को प्राप्त होनेवाला होता है प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति करता है, शरीर के अंग-प्रत्यंगों की शक्ति को बढ़ाता है, [ख] (अच्छायः) = [तमो वर्जितः सा० ] अन्धकार से रहित जीवनवाला होता है अथवा 'छादेर्भेदने' भेदन की वृत्तिवाला नहीं होता, तोड़-फोड़ के ही काम नहीं करता रहता, सदा आलोचक न बना रहकर स्वयं कार्य में प्रवृत्त होता है। [ग] (अपलाश:) = [अ+पलाश= unkind, cruel] यह क्रूर नहीं होता। सो यह 'अ+पल + आश' मांस भोजन में प्रवृत्त नहीं होता । अथवा 'अ+पर+ आश' दूसरों के भोजन को खानेवाला नहीं होता, परपिण्डोपजीवी नहीं होता । समाज में parasite बनकर समाज शरीर को हानि पहुँचानेवाला नहीं होता। [घ] (अर्वा) = [ going, moving, running] गतिशील होता है, [अर्व् To kill ] गतिशीलता के द्वारा बुराइयों का संहार करनेवाला होता है। [ङ] (माता) = निर्माण करनेवाला होकर (तस्थौ) = जीवन में स्थित होता है । सदा निर्माणात्मक कार्यों में रुचिवाला होता है। [च] (विषितः) = [अबद्धः ] अनासक्त होकर, शरीर रक्षा के लिये ही (अत्ति) = सांसारिक भोग्य पदार्थों का ग्रहण करता है। कभी स्वाद के लिये नहीं खाता। [छ] (गर्भ:) = [गिरति अनर्थान् नि० १० । २३] अनर्थों को नष्ट करनेवाला होता है, वस्तुतः अनासक्तभाव से संसार में चलने का यह स्वाभाविक परिणाम है कि अवाञ्छनीय रोगादि उत्पन्न न हों। [२] (अन्यस्या:) = [ strange] इस असाधारण वेदवाणी के [ अन्या = Not drying up ] कभी न सूखनेवाली सरस्वती नदी रूप इस वाणी के (वत्सं) [ वदति] = उच्चारण करनेवाले को (रिहती) = चाटती हुई, जिस प्रकार गौ चाटकर बछड़े के शरीर को स्वच्छ कर देती है, इसी प्रकार यह वेदवाणी रूप गौ भी अपने वत्स को चाटकर शुद्ध बना देती है। (मिमाय) = यह वेदवाणी उसके जीवन का निर्माण करती है [निर्मिमीते] । [३] (धेनुः) = यह ज्ञानदुग्ध को देनेवाली वेदवाणीरूप गौ (कया भुवा) = बड़े आनन्दमय भाव से (ऊधः निदधे) = ज्ञानकोश को इस वत्स के लिये धारण करती है। ऊधस्-दुग्धकोश होता है, यहाँ वेदवाणीरूप गौ का ऊधस् उसका ज्ञानकोश है। यह वेदवाणी प्रेम से इसे अपने वत्स को प्राप्त कराती है। क्रुद्ध हुई हुई माता बच्चे को दूध पिलाती है तो दूध उतना गुणकारी नहीं होता । सो यह वेदमाता तो आनन्दमय भाव से युक्त हुई हुई ही अपने प्रिय को दूध पिलाती हैं। यह दूध उस 'वत्स' के जीवन का निर्माण करता है ।
Connotation: - भावार्थ- वेदवाणी अपने ज्ञानदुग्ध के द्वारा हमारे जीवन का सुन्दरता से पोषण करे ।