नति से उन्नति [नभ्रत्वेनोन्नमन्तः]
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार प्रकृति को मित्र बनानेवाला व्यक्ति (पत्तः) = [पद् गतौ] गति के दृष्टिकोण से, अर्थात् शरीर यात्रा चलती रहे इसीलिए जगार भोजन करता है । [२] यह (प्रत्यञ्चम्) = प्रत्येक व्यक्ति की ओर जानेवाले भोजन को (अत्ति) = खाता है, अर्थात् यज्ञ में आहुति देकर और इस यज्ञ के द्वारा सभी को कुछ भोजनांश प्राप्त कराके ही भोजन को करता है। अकेला न खाकर सदा यज्ञशेष का सेवन करता है । [२] (वरूथम्) = अपने धन को [wealth] (शीर्ष्णा शिरः) = [per head] प्रति व्यक्ति के लिये (प्रतिदधौ) = धारण करता है। यह राजा को कर के रूप में धन देता है, राजा उस धन का विनियोग सारी प्रजा के हित के लिये करता है । [३] (उपसि आसीनः) = उपासना में स्थित हुआ हुआ यह व्यक्ति (ऊर्ध्वाम्) = इस [ get the upper hand] प्रबल हुई हुई प्रकृति को (क्षिणाति) = [ हिनस्ति] नष्ट करता है, अर्थात् उपासना के द्वारा यह इस प्रकृति को अपने पर प्रबल नहीं होने देता। [४] (न्यङ्) = [नि अञ्च्] सदा नम्रता से गति करता हुआ यह (उत्तानां भूमिं अन्वेति) = उन्नत प्रदेश को, उन्नत स्थिति को प्राप्त करता है। नम्रता से चलता हुआ यह सदा उन्नत होता जाता है । भर्तृहरि के शब्दों में 'नम्रत्वेनोन्नमन्तः ' ये लोग नम्रता से उन्नत होते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - हम यज्ञशेष को खानेवाले बनें, शरीर यात्रा को चलाने के लिये हमारा भोजन हो, प्रकृति को हम अपने पर प्रबल न होने दें और नम्रता से चलते हुए उन्नति को प्राप्त हों ।