Word-Meaning: - [१] इस जीवन-यात्रा में गत मन्त्र के अनुसार जब अज बनकर हम शरीर- रथ की धुरा का आवर्तन करें तो वे (पूषा) = सबका पोषण करनेवाले, (माहिनः) = महिमा सम्पन्न प्रभु (अस्माकं रथम्) = हमारे इस शरीर - रथ को ऊर्जा बल व प्राणशक्ति के द्वारा (अविष्टु) = रक्षित करें। उस प्रभु के रक्षण में ही हमारे लिये किसी भी प्रकार की उन्नति का सम्भव होता है । [२] वे प्रभु (वाजानाम्) = हमारी शक्तियों के (वृधः) = वर्धन करनेवाले (भुवत्) = हों । शक्ति-वर्धन के द्वारा ही रक्षण होता है । शक्ति हास ही विनाश का मार्ग है। [३] वे प्रभु (नः) = हमारी (इमं हवम्) = इस प्रार्थना को (शृणवत्) = अवश्य सुनें। हमारी प्रार्थना न सुनने योग्य, न समझी जाए। पुरुषार्थ से हम अपने को पात्र बनायें जिससे प्रभु हमारी प्रार्थना को अवश्य पूर्ण करें ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु ही हमारे शरीर रथ के रक्षक हैं, वे ही हमारी शक्तियों का वर्धन करते हैं । सूक्त का प्रारम्भ स्पृहणीय बुद्धियों की प्राप्ति की कामना से होता है । [१] इन बुद्धियों से हम सर्वत्र जलवायु में उस प्रभु की महिमा का अनुभव करते हैं, [२] ये प्रभु ही हमारा पोषण व हमारे पर सुखों का वर्षण करते हैं, [३] हमारी बुद्धियों को सिद्ध करते हैं, [४] वे हमारे सच्चे मित्र हैं, [५] हमारा शोधन करते हैं, [६] मलों का अपहरण करते हैं, [७] इस प्रकार हमें शरीर - रथ की धुरा के वहन के योग्य बनाते हैं, [८] वे ही हमारी सब शक्तियों को बढ़ाते हैं, [९] वे प्रभु यजमान यज्ञशील को ही शक्तिशाली बनाते हैं।